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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

ताबूत में आखिरी कील

महेश चंद्र द्विवेदी

जब मैं छोटा था, तब प्रतिप्रातः मेरे ताऊ गांव के कुएं पर स्नान के पश्चात उससे सटे हुए बराम्दे में रखे बड़े से तख़्त पर पाल्थी मारकर बैठ जाते थे। फिर मोटी सी रामचरितमानस खोलकर नक्काशीदार लकड़ी के फ़ोल्डिंग स्टेंड पर रख कर ज़ोर-ज़ोर से पढ़ते थे। उसके पहले ‘रघुकुल रीति सदा चल आई, प्राण जांय पर वचन न जाई’ जैसी चौपाइयां, जो उन्हें कंठस्थ थीं, गाते रहते थे। उस चौपाई को दिन-प्रतिदिन सुनकर मेरे मन में धारणा बन गई थी कि हमारे समाज में दिये हुए वचन का महत्व बहुत अधिक है। फिर मैने माध्यमिक विद्यालय में राजपूतों द्वारा अपने वचन पर मर मिटने के किस्से इतिहास में पढ़े, तब मेरी यह धारणा और दृढ़ हो गयी थी। परंतु मुझे इस विषय में जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ सीखना बाकी था। अपनी इस धारणा के कारण मैने बारम्बार धोखे खाये हैं। आजकल भी इस विषय के एक ज्ञानवर्धक अनुभव से गुज़र रहा हूं।

मेरी 92 वर्षीय सासु मां मेरे साथ रहतीं हैं। उन्हें चौबीस घंटे एक महिला परिचारिका की आवश्यकता होती है। मेरी पत्नी अपनी स्वयं की स्वास्थ्य समस्या एवं व्यस्तता के कारण उन्हें लगातार सहायता करने में असमर्थ हैं। अतः सासु मां की देखभाल हेतु एक परिचारिका रहती है। गत सप्ताह सासु मां की यह परिचारिका एक सप्ताह की छुट्टी पर जाने वाली थी, तो मैने परिचारिका दिलाने वाली एजेंसियों से सम्पर्क किया और उन्हें एक सप्ताह मात्र के लिये 92 वर्षीय सासु मां हेतु रात-दिन दोनो के लिये परिचारिका की आवश्यकता बताई। दूसरे दिन एक स्त्री आई जिसके साथ एक बच्चा था। बातचीत में उसने स्पष्ट किया कि वह दिन में दूसरी जगह काम करती है, केवल रात में आ सकती है, परंतु साथ में उसका बच्चा भी होगा। उसने यह भी कहा कि वह समझती थी कि नौकरी लम्बे समय के लिये है। अतः उसे वापस करना पड़ा। कुछ घंटे बाद एक महिला और प्रकट हुई। यह बताने पर कि मेरी आवश्यकता एक सप्ताह की ही है, वह भी नाक-भौं सिकोड़ कर चली गई। जब मैने सम्बंधित एजेंसी को यह बात बताई, तो उन्होंने मेरी दुनियादारी की अज्ञानता पर हिकारत भरे जैसे स्वर में कहा, “आप को यह नहीं बताना चाहिये था कि आवश्यकता एक सप्ताह की ही है। कह देते कि इसका उत्तर अपनी एजेंसी वालों से पूछो।“ तब मेरा ज्ञानवर्धन हुआ कि हमारे यहां स्पष्ट बात बताना कमअक्ली का द्योतक होता है। होशियारी इसमे है कि दूसरे को कन्फ़्यूज़न में डाले रहो।

दूसरी रात को एक अन्य एजेंसी ने एक महिला को भेजा। वह टेलीफोन पर मेरा पता मुझसे पूछकर आई। आने के आधा घंटा बाद वह बोली कि उसे अभी पांच दिन तक ठाकुरगंज (मेरे घर से 15 किलोमीटर दूर) में एक घर में दिन में काम करना है, और तब तक वह केवल रात में आ सकती है, परंतु वहां से आने-जाने में बहुत समय लगेगा और तीन सौ रुपया प्रतिदिन किराया का लगेगा। यह फ़रमान सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि अपना सिर पीटूं या उसका। जब एजेंसी ने उसको मेरा फोन नम्बर दे दिया था, तब उसने यह बात आने से पहले मुझे क्यों नहीं बताई। अगली प्रातः उसे रात भर का वेतन और तीन सौ रुपया दक्षिणा (किराया) देकर विदा करना पड़ा।

फिर दिन में एक अन्य महिला एजेंट का पता चला। मेरे द्वारा फोन पर अपनी आवश्यकता बताने पर उसने कहा कि रात की ड्यूटी के लिये परिचारिका भेज सकती है, परंतु .....रुपये (जो सामान्य दर से 150 अधिक थे) प्रति रात्रि लगेंगे। बिना एक सेकंड को झिझके मैने “ठीक है” कह दिया। दो घंटे बाद उस महिला एजेंट का फोन फिर आया कि उसने परिचारिका से बात कर ली है, परंतु वह रात्रि में ड्यूटी होने के कारण 100 रुपये प्रति रात्रि और अधिक मांग रही है। मुझे यह तो लगा कि मांग काफ़ी अधिक है परंतु मेरा दृष्टिकोण है कि कोई निर्धन व्यक्ति कुछ अधिक भी ले जाय, तो कोई हर्ज़ नहीं है, अतः मैने फिर बिना रुके हां कर दी। कुछ देर बाद मुझे ज्ञात हुआ कि मैने बिना मोल-भाव किये हां करके बड़ी ग़लती कर दी थी क्योंकि उस एजेंट का पुनः फोन आया कि महिला का कहना है कि कम से कम 15 रात्रि की ड्यूटी करेगी अथवा कम से कम 15 रात्रि का भुगतान लेगी। अब मुझे गुस्सा आ गया और मैने यह कह कर फोन रख दिया कि मुझे सुरसा के समान मुंह फाड़ने वाली परिचारिका नहीं चाहिये। दूसरे दिन इसी एजेंट ने मुझे तीन बार फोन किया कि वह परिचारिका कम दिन तक भी काम करने को तैयार है, उसको किस समय भेज दें; परंतु मैने हां नहीं की।

उसी दिन एक एजेंसी ने शाम को एक अन्य महिला को भेजने को कहा। चूंकि किसी एजेंसी अथवा किसी सहायिका द्वारा सच बोलने के विषय में मेरा विश्वास हिल चुका था, अतः सात बजे मैने फोन मिलाकर पूछा कि वह महिला कितने बजे आ जायेगी। मेरी आशंका सच निकली और एजेंसी से उत्तर मिला कि आज वह बाहर चली गई है, कल रात को अवश्य पहुंचेगी। दूसरी रात को भी महिला तो नहीं आई, उसका फोन अवश्य आया। मेरे घर का पता पूछकर वह बोली, “आज तो अंधेरा हो चुका है। अब मैं आप का मकान नहीं ढूंढ पाऊंगी। इसलिये आज नहीं कल आऊंगी।“ उस दिन सासु मां और मेरी पत्नी दोनो इतने अस्वस्थ थे कि न चाहते हुए भी मैं बमक पड़ा कि पहले से यह बात बता देने में क्या जीभ में कांटे चुभते थे।

फिर मैने किसी प्रकार अपने को शान्त किया। तब मुझे ए. ओ. ह्यूम, जो 19वीं सदी में भारतीयों की दुर्दशा के प्रति अत्यंत सम्वेदनशील अंग्रेज़ थे एवं जिन्होंने भारतीय समाज के उत्थान के लिये वर्ष 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की थी, की याद आ गई। वह 19वीं सदी के अंत में इंग्लैंड वापस चले गये थे। वहां जाने के बाद उन्होंने एक भारतीय मित्र को पत्र लिखा था, जिसमें भारतीयों के चार प्रमुख अवगुणों को रेखांकित करते हुए बताया था कि यदि भारतीय उन्हें त्याग दें तो अपने अन्य गुणों के कारण अत्यंत प्रगतिशील समाज का निर्माण कर सकते हैं। उनमें से एक था अपनी बात का पक्का (विश्वसनीय) न होना।

ह्यूम साहब की यह बात आज सवा सौ साल बाद भी हम पर कितनी लागू है, का अकाट्य पुष्टिकरण तब हुआ, जब एक सप्ताह की छुट्टी मांगकर गई हुई नियमित सहायिका ने सप्ताह पूरा होने पर हमें कहलवा दिया है कि अब वह वापस काम पर न आ सकेगी। हमारे समाज में वचन के प्रति प्रतिबद्धता की मेरी धारणा को ध्वस्त कर देने को यह ‘ताबूत में आखिरी कील’ है।


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