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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

दो कदम साथ चलिए मेरे

सलिल सरोज

दो कदम साथ चलिए मेरे फिर हालात बदलिए मेरे तन ही सारा छिल जाएगा जो ज़ख्मों से गुजरिए मेरे जान जाते दर्द की गहराई साथ ही डूबिए,उभरिए मेरे ज़िन्दगी कोई हादसा लगेगी बिखरे ख़्वाबों में चलिए मेरे


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