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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

एक दिन तेरा घर भी जलेगा

सलिल सरोज

तेरा न बोलना बहुत देर तक खलेगा एक न एक दिन तेरा घर भी जलेगा नज़र बंद हो अपनी बोई नफरतों में फिर रहीम और कबीर कहाँ मिलेगा चाँद को चुराके रात को दोष देते हो इंतज़ार करो , आसमाँ भी पिघलेगा जाति,धरम,नाम सबसे तो खेल लिया अब कैसे कृष्ण , कैसे राम निकलेगा पानी,हवा,मिटटी सब तो बँट गए हैं किस आँगन में अब गुलाब खिलेगा सब को बदल दिया खुद को छोड़के सच को झूठ से और कितना बदलोगे


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