मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

थक गया है दिल

डॉ० अनिल चड्डा

थक गया है दिल तेरे लिए धड़कते-धड़कते,
कई बार बचा हूँ मैं मरते-मरते।

हरेक शै में ढूँढता हूँ मैं तेरा ही नाम,
खुद भी खो गया हूँ तुझे ढूँढते-ढूँढते।

वो राह न मिली जिस पर मिले थे तुम,
थक गया हूँ अब मैं चलते-चलते।

न सुननी थी तुझे, न कभी सुनी तूने मेरी,
बहक गया हूँ मैं दिल की कहते-कहते।

नींद आती नहीं, जाग मैं पाता नहीं,
रह जाते हैं आंखों में सपने आते-आते।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें