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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

10 सितंबर, जन्मदिन पर विशेष-
हिमालय पुत्र: गोविंद बल्लभ पंत

पवनेश ठकुराठी 'पवन'

भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितम्बर,1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूँट नामक गांव में हुआ था। गोविंद बल्लभ पंत ने अपनी कालेज स्तरीय शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की और वर्ष 1909 में उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। प्रसिद्ध काकोरी मुकद्दमे ने उन्हें एक वकील के रूप में पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई। गोविंद बल्लभ पंत एक समर्पित देशभक्त थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी को स्वर्णाक्षरों में लिखने वाले देशभक्तों में इनका महत्वपूर्ण योगदान था।

गोविंद वल्लभ पंत बचपन से ही मेधावी थे। यही कारण है कि उनके सहपाठी उन्हें गोविंद बल्लभ "महाराष्ट्र" कहा करते थे। उन्होंने अपनी वकालत काशीपुर से ही शुरू की थी। उन्होंने सन् 1914 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की एक शाखा के रूप में काशीपुर में प्रेमसभा की स्थापना की। 1916 में गठित कुमाऊं परिषद के निर्माण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। गोविंद बल्लभ पंत ने 29 नवंबर 1928 को लखनऊ में साइमन कमीशन के विरूद्ध लाला लाजपतराय का साथ दिया, जिस कारण उन्हें नेहरू के प्राणों की रक्षा करते समय गंभीर चोटें भी आईं।

गोविंद बल्लभ पंत 1934 में अखिल भारतीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष तथा केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। सन् 1937 में इन्हीं के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश में पहला कांग्रेसी मंत्रिमंडल बना। वे अंग्रेजों द्वारा 9 अगस्त 1942 को मुंबई में गिरफ्तार कर लिए गए तथा 31 मार्च 1945 तक उन्हें अहमदनगर के किले में नजरबंद रखा गया। 1946 में वे दुबारा उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चयनित हुए और मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार उत्तरप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनने का गौरव उन्हें प्राप्त है। वे दिसंबर 1954 तक मुख्यमंत्री बने रहे और 10 जनवरी 1955 को केंद्रीय केबिनेट में गृहमंत्री बनाये गये। 26 जनवरी 1957 को इन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने राजनीतिक रूप से पिछड़ेमाने जाने वाले पर्वतीय प्रदेशों को देश के राजनीतिक मानचित्र पर जगह दिलाई। पंत जी की वकालत के बारे में कई किस्से मशहूर थे। कहा जाता है कि जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे और जो झूठे मुकदमे लड़ने के लिए कहते थे, उनके मुकदमे लड़ने के लिए पंतजी साफ इनकार कर देते थे। वे ईमानदार और देशभक्त राजनेता थे। वे महात्मा गांधी को आदर्श मानते थे और उनके ग्रामीण विकास और पंचायती राज के प्रबल पक्षधर थे। भारत के गृहमंत्री के रूप में वह आज भी प्रशासकों के आदर्श हैं।

पंत जी देशभक्त राजनेता ही नहीं वरन् एक चिंतक, मनीषी और समाजसुधारक भी थे। हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 7 मार्च, 1961 को पक्षाघात के कारण इस देशभक्त राजनेता का निधन हो गया। पं. गोविंद बल्लभ पंत की कार्यशैली अत्यधिक पारदर्शी और व्यक्तित्व हिमालय-सा विराट था। इसीलिए तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें हिमालय पुत्र की उपाधि से विभूषित किया था।


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