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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

विज्ञा तिवारी "स्वयं"

आत्मसंतुष्टि

मैं पेशे से एक बैंकर हूं। बैंक एक ऐसी सरकारी संस्था है जहाँ समाज के हर तबके के लोग आते हैं। कोई अपनी परेशानी लेकर आता है, तो कोई खुशी बांटने, कोई बैंक के कामकाज से त्रस्त है, तो कोई अभिवादन करते नहीं थकता, पर मुख्य बात ये है कि समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति से लेकर अमीरों तक सब इस संस्था से जुड़े होते हैं।

मैं बैंक में ऋण विभाग में अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं। पद की गरिमा का निर्वाह करते हुए मैंने अपनी नौकरी के ३.५ साल निकाल दिए। ऊपर वाले की कृपा से अभी तक किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया। इस पद पर रहते हुए मैंने न जाने कितनी गरीब औरतों की मदद की है, न जाने कितने ही लोगों को नई गाड़ियां और घर खरीदने के अवसर दिये हैं सिर्फ उनके लिए उचित ऋण करके। पर असली खुशी तब होती है जब जिस मकसद के लिए किसी व्यक्ति को ऋण के अन्तर्गत पैसा दिया गया और वो मकसद कुशलतापूर्वक पूरा हो गया हो और व्यक्ति अपनी खुशी में बैंक वालों को भी भागीदार समझे।

अभी इसी साल फरवरी महीने में एक मुस्लिम दम्पति बैंक आए थे। पास ही के इलाके में वो मुस्लिम परिवार किराए के दो मंजिला मकान में रहते थे और उसी मकान को अब वो खरीदना चाहते थे। श्रीमान जी व्यापार चलाते थे और उनकी बेगम उनका घर चलाती थीं। बातचीत के दौरान उन्होंने अपने उसी किराए के घर को खरीदने के लिए ऋण लेने की इच्छा जाहिर की। इसी के उपलक्ष्य में सारे दस्तावेज पूरे करके उनको ऋण के रूप में पैसे देने की व्यवस्था की गई। एक बात जो इस पूरी बात की जड़ में है कि जिनसे मुस्लिम दम्पति घर खरीद रहे थे वे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति थे। उन्हें अपने छोटे बेटे की किडनी की बीमारी के इलाज के लिए एक बड़ी और एकमुश्त रकम की आवश्यकता थी। जिससे वे अपने बच्चे का ऑपरेशन करा कर उसे और उसके परिवार को नई ज़िन्दगी देना चाहते थे। उनका बड़ा लड़का अपने छोटे भाई को अपनी एक किडनी दे रहा था, इसीलिए अपने छोटे बेटे को बचाने के लिए बूढ़ा बाप अपने पुश्तैनी मकान को बेच रहा था। खैर बैंक को भावनाओं से क्या मतलब? हमें तो अच्छी पार्टी और प्रॉपर्टी मिलनी चाहिए और लीजिए लोन हो गया। उनकी आवश्यकता की श्रेणी में वक़्त की कमी का ध्यान रखते हुए हमने हर तरह की काग़ज़ी कार्यवाही को पूरा कर लिया था और फिर ऋण के पैसे लेकर मुस्लिम परिवार ने मकान की रजिस्ट्री करा ली। जिस दिन रजिस्ट्री हुई उस दिन वे बुज़ुर्ग व्यक्ति आए और उस मकान को बेचने से मिली धनराशि उन्होंने दिल्ली के उस अस्पताल को स्थानांतरण कर दी जहां उनके बेटे का ऑपरेशन होने वाला था। लगभग एक महीने बाद, होली से पहले मुस्लिम परिवार से खबर मिली कि बाऊजी के लड़के का ऑपरेशन हो गया और सपरिवार वो अपने दोनो लड़कों की तीमारदारी में लगे हैं। सुन कर अच्छा लगा कि चलो अगर किसी ने नया मकान खरीदा तो किसी ने अपने बेटे को उन्ही पैसों से बचा लिया।

पर भविष्य के गर्त में क्या छुपा है ये किसी को नहीं मालूम। होली के कुछ दिन बाद बैंक के किसी काम से जब मुस्लिम दम्पति फिर शाखा आए तो मैंने उत्सुकतावश पूछा कि अब बाउजी का लड़का स्वस्थ है एवं घर आ गया क्या?

इस पर श्रीमान ने बताया कि जिस लड़के का ऑपरेशन हुआ था उसका इंतकाल हो गया। मैं ये सुन कर अवाक रह गई और अनायास ही मेरे मुंह से “क्या" निकल गया। जैसे मैंने कुछ और ही सुन लिया हो। इस पर उन्होंने बताया कि ऑपरेशन तो सफल रहा था पर डॉक्टर उनके लड़के को कुछ दिन अस्पताल में अपनी निगरानी में रखना चाहते थे। परंतु होली के त्योहार के उपलक्ष्य में परिवार वाले ज़बरदस्ती लड़के को घर ले आए और त्योहार में न जाने किस लापरवाही ने उस लड़के की जान ले ली।

जो क्षति बाऊजी को हुई उसकी भरपाई तो नामुमकिन थी पर एक बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि हर एक पल बहुत शक्तिशाली है। एक पल में आप खुशी से सराबोर हो जाते हैं और अगले ही पल में दुःख की लहर भी छा सकती है। वक़्त सबसे बलवान है। वक़्त के गर्त में क्या छुपा है ये सिर्फ भविष्य ही जानता है। मेरा मन काफ़ी देर तक अशांत रहा पर फिर अपने जीवन और अपनों की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा होती हैं, कि ये भूल जाना लाज़मी है कि उन बूढ़े कंधों पर वक़्त ने उनके अपने बेटे की ज़िम्मेदारी तो खत्म कर दी थी पर दो छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी बढ़ा दी थी।

बेशक बैंक ने पैसे मकान खरीदने के लिए दिए थे और वो मकसद पूरा भी हो गया था पर एक अदृश्य मकसद अधूरा भी रह गया था। पहली बार ऋण देने का मकसद तो पूरा हो गया पर आत्मसंतुष्टि अधूरी रह गई।


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