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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

शंका के दायरे

राजीव कुमार

एक वरिष्ठ मनोचिकीत्सक शक के घेरे में आ गए। उनको शक था कि श्रेष्ठ मनोचिकीत्सक का पुरस्कार नहीं मिलने के पिछे विरोधियों की साजीश और सहयोगियों का घर का भेदी होना है। इसी शक और चिन्ता में खुद को खोखला करने लगे। वो कभी कहते ’’ इस पेशे को त्याग दुंगा। दूसरा कोई काम करूंगा। ’’

उनकी पत्नी ने समझाते हुए कहा ’’ आप हिम्मत मत हारीये। भगवान ने चाहा तो अगला पूरस्कार आपको ही मिलेगा। खुद को कमजोर मत बनाइए। ’’

उनके सारे रिश्तेदार, परिवार के सदस्य, मनोचिकीत्सक मित्र समझा कर थक गए।

उनकी पत्नी ने अंजाने में एक आदमकद दर्पण अपने कमरे में रख दिया। वो दर्पण के सामने जाने में भी कतराते लगे और कभी-कभी तो दर्पण को एकटकम निहारते रहते। तभी एक दिन दर्पण में आकर उनके अपने ही रूप ने आकर उनकी अंतरात्मा ने कहा ’’ सोचो उस दिन को जब तुम मनोचिकीत्सक नहीं थे और तुम इसकी पढ़ायी करने से भी जी चुरा रहे थे। और आज तुम वरिष्ठ मनोचिकीत्सक हो। तुम सोचो कि मैं श्रेष्ठ हूं। इस बार नहीं तो अगली बार ही सही श्रेष्ठ मनोचिकीत्सक का पुरूस्कार मैं ले कर ही रहुंगा। ’’

बहुत आत्ममंथन करने के बाद मनोचिकीत्सक शक और सदमें के दायरे से बाहर निकल पाए और खुद को पेशेवर दौड़ में शामिल किया।


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