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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

क्षणिकाएँ

पुष्पा मेहरा

१. प्रकृति विलाप कर रही बाढ़ बन के ढल रही नींद को जगा रही स्वप्न को हर रही | २. भीड़ में खोये हुए मंजिलें ढूँढते रौशनी जो पास है दूर उसे ढूँढते | ३. मन के महाभारत से युद्ध हम ठान लें हार हो जीत हो कर्म - धर्म मान लें | ४. सूरज का संग हो मन ये नि:शंक हो अँधेरे को जीत लो रोशनी का दम भरो |

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