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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

उदगार

वीरेंद कौशल

मेरे दिल से निकले उदगार अल्फाज के सहारे यार क्या मिला मानो पवित्र त्योहार हो गया पहली झलक में निशब्द ही प्यार हो गया हम तो यूँही कारते रहे मलाल ज़िन्दगी में तुझे पाने के बाद दोस्त मैं सदाबहार हो गया मेरी कुछ नयी कोशिश शब्दों के साथ दोस्त सदा दोस्त अरमान जैसे तिरंगे होते हैं न कोई वैचारिक मतभेद या पंगे होते हैं साथ रहते सदा मस्त जैसे मिला कोई खज़ाना भाव दिल के सदा हर हर गंगे होते हैं


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