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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

मेरी मिट्टी

विकास त्रिपाठी

जन्म और कर्म है इस भारत की मिट्टी में मेरा, इस मिट्टी को बदनाम ना होने देंगे। तुम रच लो साजिश चाहे जितनी, कोई बुरा काम ना होने देंगे।। इसी में है सारा संसार हमारा, सुन लो, ओ! जयचंद की औलादों, अब तुमको देश पहचान गया है। धधक उठी है वह ज्वाला, कोई पृथ्वी अब न हारेगा।। कह दो नापाक इरादा वालों से भी, न कुचले हमारी मासूम सी कलियो को। न खेले मां बहनों की आबरू से, नहीं तो महाप्रलय आ जाएगा। चारों तरफ हाहाकार मच जाएगा, मिटा देंगे उनका नामोनिशां भी इस जहां से।। इतना भी हमको मजबूर न कर ये दरिंदे, कि कलम पकड़ने वाले हाथों को हथियार उठाना पड़ जाए। फिर इतिहास की क्या हस्ती है, पूरा भूगोल भी बदला जाएगा। ऐसा रच देंगे नया इतिहास-भूगोल , कि तुम्हारा अस्तित्व ढूंढना भी मुश्किल हो जायेगा। इस मिट्टी के लिए चाहे मिट जाए नाम हमारा, पर इस पुण्य भूमि पर कोई कुकर्म ना होने देंगे इस मिट्टी के लिए समर्पित हो जीवन मेरा, हे ईश्वर! इस मिट्टी में ही मेरी मिट्टी हो ।।


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