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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

सभी को जोहार
(आदिवासी दिवस पर )

सुशील शर्मा

मैं तो आज भी खड़ा हूँ पथरीले बियावान में मेरे कंधे पर टंगा है। मेरी पत्नी का शव जो मर चुकी थी तुम्हारे आलिशान अस्पताल के सीलन भरे कोने में। बाजू में बिलखती मेरी बेटी और मैं निःस्तब्ध ! फिर तुमने सारी संवेदनाओं को कुचल कर कहा जाओ यहाँ से बिलखती बेटी का हाँथ पकड़े उसकी मरी माँ को काँधे पर डाल चल दिया। बगैर किसी से कोई शिकायत किये। विकास की अंधी दौड़ में सिमटती हमारी आदिवासी संस्कृति कई सौ साल में विकास के नाम पर चौड़ी सड़कें, राष्ट्रीय उच्च मार्ग, रेलवे लाईन, खनन व्यवसाय और हमारे हिस्से में आया है सिर्फ विस्थापन अपनी पुस्तैनी संस्कृति के उजाड़ की पीड़ा। मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था छीन रही है हमसे हमारा अधिकार कर रही है हमें शहर में दुकानों पर कप प्लेट धोने के लिए मजबूर। आदिकाल से अस्तित्व के संकट से झूझते हम आज भी हम अपने वास्तविक इतिहास को खोज रहें हैं। राम रावण युद्ध में दोनों तरफ से सिर्फ मैं ही मरा। अर्जुन को बचने के लिए घटोत्कच्छ के रूप में। मेरी ही बलि दी गई। एकलव्य के रूप में सिर्फ मेरा ही अंगूठा काटा गया। आदिवासी अस्मिता की लड़ाई मैं आज भी लड़ रहा हूँ। सभी जुल्म सह कर मूक रह कर। सभी को जोहार करके।


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