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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

कश्मीर हूँ मैं

शुचि'भवि'

                  
कश्मीर हूँ मैं
मगर सच कहूँ
अब तक भारत की पीर हूँ मैं
अंग सदा से भारत का ही रहा
मगर बहाता कितना नयन नीर हूँ मैं
सच अब बहुत हुआ ये खेल
 शांति के लिए अब अधीर हूँ मैं
कुछ बदलाव 72 वर्ष पूर्व था हुआ
मैं चुप रहा
भारतीय हूँ
संस्कारी हूँ
कुछ बदलाव अब फिर है हुआ
मैं चुप हूँ
भारतीय हूँ
संस्कारी हूँ
हर अच्छे-बुरे बदलाव को
सहलशीलता की हद से आगे बढ़कर
सहा है मैंने
अपनी पुष्पों से सजी लाल धरा को
लहू से लाल देख 
कुछ न कहा है मैंने
जन्नत माना सभी ने मुझे
मगर जन्नत सा रहने नहीं दिया
साधारण ही रहने दो अब मुझे
भारत का अंग था,हूँ, रहूँगा ही
खुलकर अब कहने दो मुझे,,,
			

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