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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

ज़िन्दगी की सांझ में

शबनम शर्मा

ज़िन्दगी की सांझ में इक राग छेड़कर मुझे चूल्हे के पास अपनी कंबली में बिठा लेना। छोटी-छोटी लकड़ियाँ मैं लगाती जाऊँगी ताकि तुम्हारी साँसों की गरमाहट का अहसास होता रहे मुझे। बड़ी लकड़ी सिर्फ़ तुम ही लगाना शायद मुझे नींद आ जाये तुम्हारे सीने से लगकर, तृप्त हो जाये वो पिपासा जो ताउम्र तुम्हारा सानिध्य ढूँढती रही। ज़रूर अंकित करना मेरे लबों पर चुंबन जो बड़ी लकड़ी के राख होने तक गरमाहट देता रहे।


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