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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

रजस्वला होना कोई शर्म की बात नहीं

रश्मि सुमन

रजस्वला होना कोई शर्म की बात नहीं न ही यह कोई मुद्दा है तो बस यह केवल एक कुदरती प्रक्रिया पर, क्या करूँ हर महीने के इन पाँच दिनों की मुश्किलों में जब दर्द से खिंच जाती है पेट व कमर की अंतड़ियां इससे उठती बेचैनी और दर्द और मेरी बिन ब्याही इच्छाओं पर समाज की भेदती नज़रों से जब गिरता है कौमार्य तो आडंबर में बहा देती हूँ अपनी पवित्रता.... क्या करूँ कि इन पाँच दिनों की झंझटों में जब कभी जाती हूँ "उसे" खरीदने लोगों की घूरती निगाहों के बीच तब दुकानदार भी काली पॉलीथिन में लपेट मुझे ‘वो’ चीज चुपके से पकड़ा देता और पीछे पलट उसे देखो तो उसका पुरुषत्व मुस्कुरा रहा होता मजबूरी यह कि स्कूल ,घर,कॉलेज या ऑफिस में कुर्सी पर देर तलक बैठा भी तो नहीं जाता क्या करूँ कि हर महीने के इस पांच दिवसीय मुश्किलों में हालाँकि मैं अपने काम में प्रवीण हूँ पर कल रात उठे दर्द से मलिन हूँ रह रह कर असामान्य व अशांत महसूसता मन पर यह कोई चिंता नहीं है मेरी बल्कि पीछे कुर्ती पर लगा कोई ‘धब्बा’ से असहज है मन संवेदना शून्य समाज क्या जाने इस पीड़ा को इनकी गन्दी सोच पर हैरानी जताऊं या फिर समझाऊं कि नालियों में मेरा बहता खून यह खून नहीं चीत्कार है " उन दिनों " में उठी मेरी वेदना का और तुम समझते हो धमनियों में प्रवाह है लहू का.... मैं जो ऋतुमती का लहू या माँस के लोथड़े नालियों में बहाती हूँ उसी मांस के टुकड़े से तुम पुरुषों की वजूद के लिए, ‘कच्चा माल’ जुटाती हूँ और इसी रजस्वला के दर्द से मैं वो सराव पाती हूँ तभी तो अपनी जान पर खेल तुम्हें दुनिया में लाती हूँ और खुद दूसरा जन्म पाती हूँ ऐ पुरुष प्रधान समाज! यूँ न हँसो मुझ पर कि जब मैं इस दर्द से छटपटाती हूं, इसी ऋतुमती की बदौलत तुम्हारे वजूद को इस दुनियाँ में लाती हूँ तुम्हें 'भ्रूण’ से इंसान बनाती हूं मैं तुम्हें इस दुनियाँ में लाती हूँ


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