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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

सावन आ गया है

रामदयाल रोहज

चल पड़ा आषाढ़ नरम हो गई है घाम सावन आ गया है मेघ - छाता तानकर शीतल करे हर ग्राम सावन आ गया है नम हवाएं डालियों को कह रही चुपचाप सावन आ गया है झर रहे तरुवर से मोती हो सुबह या शाम सावन आ गया है बँध गये डालों में झूले झूले राधा-श्याम सावन आ गया है मोर छाता तानकर करते हैं नृत्य गान सावन आ गया है लिख दिया है बिजलियों ने नभ में ये पैगाम सावन आ गया है दादुरों के वाद्ययंत्र बज रहे दिन रात सावन आ गया है नहा धो धूमिल फसल ने कर लिया सिंगार सावन आ गया है हतप्रभ खेतिहरों को दे रहा सौगात सावन आ गया है

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