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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

चुगलखोरी का जमाना

रामदयाल रोहज

मैंने जाना आज चुगलखोरी का जमाना है हंसते बसते घर में चुपके चुपके आग लगाना है गंगा से पावन रिश्तों को चुटकी में राख बनाना है हंसते खिलते उपवन को पल में शमशान बनाना है अहित साधना कर्म में भरपूर समय बिताना है अनघङ थोथी बातों से निज उदर की दाल गलाना है ऊँचा पद पाने को सारी हदें पार कर जाना है बिना किसी स्वार्थ के ही समंदर में आग लगाना है


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