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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

रामराज्य ना कलप1 सका

प्रदीप कुमार तिवारी

गजब सियासत देश में है, सबका सर चकराया है, पाक परस्ती में कईयों नें, देश में आग लगाया है। शांत हुई घटी में फिर से, आग लगाना चाह रहे, झूठ बोलते कई निकम्मे, घाटी अब थर्राया है।। अमन की रेखा खींच दिया, सत्ता के गलियारे ने, छप्पन इंची सीने का, साहस दिखलाया प्यारे ने। वंदन हुआ प्रधानमंत्री का, द्रोही सब हकलाये हैं, जिसकी कोई फिकर ना की, अपने देश दुलारे ने।। फाकामस्ती कर कर के, जिन वीरों ने दी है कुर्बानी, भ्रष्ट सियासत की बेलों से, रूह उनकी भी कंप जानी। आजादी के आशिकों का, रामराज्य ना कलप सका, मुफ्त में पा जाने वालों ने, की बस अपनी मनमानी।। काँप उठी थी जेलों की दीवारे, इंकलाब के नारों से, सहम गए थे सकल ब्रितानी, इकलाब के नारों से। रंग बसंती माँ का आँचल, चले गए सब बलिदानी, आज भी वो जिन्दा हैं हममें, इंकलाब के नारों से।। आजादी के दीवानों का भारत, कुछ बरबाद कर रहे, केसर की क्यारी में जाकर, आतंकी आबाद कर रहे। श्वेत खिल रही कलियों को, रक्तिम बनाने वालों ने, युवा ह्रदय को बहकाने के रोज तरकीब ईजाद कर रहे।। भारत का होकर भी जो, कश्मीर पाक सा दिखता था, सौ पचास की लालच में, जहाँ युवा शक्ति बिकता था। पत्थरबजी सेना पर करते, घाटी में तिरंगा जलाते थे, वहीँ कई नेताओं के दिल भी, नापाक दिखाई पड़ता था।। आज वही खड़े विरोध में, जो आतंकी के मित्र रहे, देश प्रेम का पहन के चोला, आतंक प्रेम के चित्र रहे। पुनः राजनीति का अरुणोदय, पूर्व दिशा से आया है, चेहरे सब बदनाम हो गए, जिनका दोहरा चरित्र रहा।। हिन्द विरोध में जो झंडा सदा जलाया जाता था, पाक ध्वजा के आगे जिसको बौना बतलाया जाता था। आज वही बन कर के हिमालय घाटी में लहराया है, आज अमन का गीत है गूंजा, जिसे दबाया जाता था। 1. कलप = जन्म लेना


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