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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

मै माँ हूँ ...

पद्मा मिश्रा

मै बहती रही हूँ -अनवरत . सदियों से सदियों तक जाने कितनी सभ्यताएं - कितनी संस्कृतियाँ .. जिनके उत्थान व् पतन की गाथाओं की . मूक साक्षी रही हूँ मै .. छिपा नहीं है कुछ भी -मैंने देखा - अनगिनत सत्ता दर्प से भरे हुए - महिमा मंडित व्यक्तित्व ... उनकी अंतर्व्यथा ... अन्तःपुर की यंत्रणायें।। प्रेम क्रीडाओं को मौन देखती रही हूँ मै .. पर नियति ने कठोर आदेश दिया मुझे . ''मृत्यु सत्य है ''-और कुछ भी नहीं .. चूरकर दो नश्वर जीवन का अहंकार , मिटा दो -- सत्ता लोलुपों का भीषण अत्याचार .. और एक दिन --वे सब के सब .. विलीन हो गए मेरी अतल गहराइयों में , मैंने उन्हें आश्रय दिया - अपने आंचल की छाँव तले -- कभी ऐसा भी हुआ --पुण्यात्माओं के भी शव .. ..दुग्ध धवल ..महिमा मंडित .. डूब गए मेरे अतल गर्भ में .. मै भेद न कर सकी -कौन कलुष ,कौन निष्कलुष ? वे सभी तो मेरे पुत्र थे .. मै माँ थी उनकी -उन मनुपुत्रों की .. मै माँ आज भी हूँ जो वर्ग जाति सम्प्रदाय से परे .. केवल मनुष्यहैं .. मै माँ हूँ ... .. !..!..!

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