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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

गंगा मैया ...

पद्मा मिश्रा

जल क़ि बूंद बूंद अमृत बन , बनती जीवन धारा, विश्वासों का दीप जलाकर, स्नेह-समर्पण सारा. गंगा मैया हर लेना तुम, सारा कलुष हमारा, करूँ अर्चना उस माटी की, कर पावन स्पर्श तुम्हारा. लहरों सा चंचल मन मेरा, धड़कन जल की धारा. स्वप्न भंवर से मन को छलते, तुम ही एक सहारा. हाट,घाट,गलियां,गलियारे बीता बचपन सारा. मुझे बुलातीं हैं स्मृतियाँ, स्नेहिल संसार तुम्हारा. जीवन की शाश्वत गति खोकर, जब राह मुक्ति की पाऊं, तेरे आँचल की छाया हो, चिर निद्रा में सो जाऊं .

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