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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

छोटी सी बूॅद बड़ी सी बाढ़

मोती प्रसाद साहू

खेत मुॅह बाये निहार रहे हैं आसमाॅ एकटक पायें तो पी जाॅय कई कई मूसलाधार बारिशों का जल एक ही सांस में किसान भी निहार रहे हैं एकटक आसमाॅ को उसी बंजर जमीं से खेती रुकी हुयी है धान की नर्सरियाॅ बूढ़ी हुई जा रही हैं ससुराल यानि दूसरे खेत जाने की प्रतीक्षा में नलों में पानी एक दिन छोड़ कर आने लगा है कहते हैं भू-जल नीचे चला गया है बूॅदें कम होती जा रही हैं दिन प्रतिदिन वर्षा की किंतु बाढ़ें बढ़ी हुई हैं पहले से कई गुना अधिक बरसात के नाम पर फुहारे छिड़क रहे हैं बादल किंतु इनसे ही गलियाॅ जाम हो गयी हैं गाड़ियाॅ बंद हैं आवागमन ठप्प है लोग घरों में कैद हैं पूरा शहर जलमग्न है टी0 वी0 पर गर्मा गरम बहसें हैं घेराव और प्रदर्शनों में नगर पालिका के खिलाफ शिकायतें ही शिकायतें संलग्न हैं कंकरीट के जंगल में पानी हुआ नग्न है पानी का घर भग्न है।

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