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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

साधु ज्ञान

लवनीत मिश्रा

साधु मिला काशी तट पर,
उसे नहीं किताबी ज्ञान,
अनुभव का वो था धनी,
फिर भी ना मन अभिमान।

मैं बोला हे! महात्मा,
क्यूँ छोडा घर बार,
मांग मांग कर खा रहे,
क्यूँ इतना लाचार।

कहे वो साधु सत्य मुझे,
सुनो व्यक्ति सच बात,
माया से कोई ना बचे,
वो सदा ही रहती साथ।

अपनी आयु में कर्म किए,
जीवन का किया उपयोग,
रिश्ते नाते सब जोडकर,
खूब किया उपभोग।

हृदय मेरे चिंता बहुत,
मन रह रह हो बैचेन,
छोड दिया निज स्वार्थ पर,
अपनों ने छीना चैन।

इस कारण साधु बना,
खोजूं खुद को हर शाम,
भोले का बस आसरा,
वो ही आए बस काम।

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