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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

प्रकृति गौहार

लवनीत मिश्रा

प्रकृति को कोसे हैं लोग,
क्यूँ उजाड़े वो अपनी कोख,
कभी सूखे से लेती जान,
कभी पानी से लेती प्राण।

कहे प्रकृति क्यूँ अपवाद,
करते क्यूँ मिथ्या संवाद,
खोदकर पर्वत किया है नाश,
नदियाँ रोकी बांध के साथ।

संतुलन कैसे हो सामान्य,
वन काटो तुम बन अनजान,
धरती अंबर तक आतंक,
प्रदूषण करती सबको तंग।

समय से गलती लो पहचान,
ढूंढो सही समय समाधान,
वरना होगा सत्यानाश,
तब किस्मत भी ना दे साथ।

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