मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज

लता प्रासर

कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृत्यु आवाज जब जब बरसाए तूने मुझ पर लाठियां जब-जब किए मेरे कोख पर प्रहार चीख भी न सकी मां की ममता बोलो बोलो हां बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज सकरी गलियों से कोठो तक का सफर कहीं आग लगाई तो कभी पी लिया जहर इन सबके बीच बोलो बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज जन्म लेकर भी तूने जननी को कोसा अपनी ही मां को विराने के हवाले किया उन वीरानों में भी मां सुनती रही किलकारी बोलो बोलो हां बोलो कैसे फटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज तुम्हें भी सोचना ही पड़ेगा जब होगे नितांत अकेले करनी पड़ती है तुम्हें भी अकेले से मुठभेड़ तब याद आती है तुम्हें मां बोलो बोलो हां बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज काली स्याह रातों में भटकते फिरते हो इधर उधर बस एक खुशी की तलाश में घर में बिखरे खुशियों को दरकिनार कर बोलो बोलो हां बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज भटको नहीं रास्तों की सीमाएं अनंत है भटकने से छूट रही है मंजिल तुम्हारी किसी की आह बुलाती है तुम्हें जिसे छोड़ दिया है तूने कराहते हुए बोलो बोलो हां बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज़ तुम्हारी कलाइयां सजती है राखियों से आस बन्धता है तुम्हें अपनी रक्षा की उसी बहन को खून से नहलाया तूने बोलो बोलो हां बोलो कैसे फूटेंगे मेरे कंठ से मृदु आवाज!

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें