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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

एक पेड़ की आत्मकथा

अनिल कुमार

                  
एक पेड़ जो कटने वाला था
भरकर आँखों में आँसू
आत्मकथा वह कहने वाला था
बरसों तक जिनकी सेवा
मैं करता आया 
आज उन्हीं ने मुझ पर धार चलाया 
खाकर मेरा फल मानव ने
मुझको ही जहर पिलाया 
मैं तो इनको देता आया
माँ-बाप की सी प्यारी छाया
पर इन हत्यारों ने
फिर भी मेरा खून बहाया
काट-छाँटकर मुझको
मेरे ही प्यारों ने
अपने स्वार्थ की बलि चढ़ाया 
मैंने दिया था इनको मन से
निस्वार्थ परोपकार के प्रण से
पर इनको
मेरी महत्ता समझ न आयी
उपकारों पर मेरे मानव ने
अपने लालच की कुल्हाड़ी थी चलायी
लेकिन अब 
मेरे सब्र का बाँध भी टूटा
मैं भी दूँगा 
दिया है मुझको जैसा
अब मेरे क्रोध से 
यह भी तर्राएँगे
जो कुछ ना किया तो
मेरे जैसे यह भी
एक दिन मारे जाएँगे।

			

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