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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

स्वतंत्र भारत के पूज्यनीय नेता जी

अमित 'मौन'

हाथ में फावड़ा उठा के वो खेतों में पहुँच जाते हैं सहानुभूति जताने को गरीब के घर खाना खाते हैं वो बड़ी बड़ी बातें करते हैं विज्ञान के विकास की सर्दी जुकाम का इलाज़ कराने विदेश चले जाते हैं उनके हिसाब से शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी तरक्की हुई मगर अपने बच्चे को सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ाते हैं ईमानदारी से आयकर भरने की अपील करने वाले ये खुद अपना पैसा विदेशी बैंक खातों में छुपाते हैं हिंदुस्तान तो एक धर्म निरपेक्ष देश है सबके लिये मगर चुनाव से पहले जातिगत सर्वेक्षण करवाते हैं जनता से मिलने को समय का अभाव है इनके पास शायद इसीलिये हर सत्र में ये संसद भंग करवाते हैं कहने को सबके आदर्श सिर्फ महात्मा गांधी यहाँ पर अब गाली गलौज के साथ ये हाथ भी उठाते हैं जिनको रोजगार मुहैया कराया है वो एहसान मंद हैं बेचारे झंडा उठाके इनकी रैलियों की शोभा बढ़ाते हैं खादी भले ना हो पर कुर्ता और कमीज सफेद ही है बातों में अपनापन जता ये सभी को टोपी पहनाते हैं वादों को भूल जायें भले पर त्यौहार नही भूला करते ईद और दिवाली पे मुबारकबाद के पोस्टर छपवाते हैं कुसूर इनका नही जादू इनके लुभावने भाषण का है परेशान होकर भी इनके निशान पे ही ऊँगली दबाते हैं बाकी जनता है सब जानती है.... गिरगिट और इंसान का फर्क पहचानती है..


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