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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

ये सोलह श्रृंगार है

नरेन्द्र श्रीवास्तव

ये सोलह श्रृंगार है,अभिसार के लिये। ये मौन इज़हार है,इक़रार के लिये।। ये बरखा की फुहार ये सावन की बहार ये चंदन सी बयार ये जियरा बेकरार ये प्रीत बेशुमार है,सत्कार के लिये। ये चूड़ी की खनक ये बिंदी की चमक ये माला की लटक ये पायल की छमक ये दर्पण दीदार है,बलिहार के लिये। ये मेहंदी की महक ये माहुर की चहक ये काजल की दहक ये कुंकुम की कहक ये प्रीत की मनुहार है,दिलदार के लिये। ये सपनों की लचक ये लज्जा की कसक ये रिश्ते की भनक ये अपनों की झलक ये अंतर पुकार है,दीदार के लिये।

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