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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

डर सा लगता है

आनन्द सिंघनपुरी

मुझको उसका आना डर सा लगता है। हर बातों पर हँसना छल सा लगता है। चलते फिरते यूँ नजरें उनसे मिलना , भटके राही को मंजर सा लगता है। जुल्फें बिखरा कर यूँ राहों पर चलना क्यों मुझको ठहरा बादल सा लगता है। उसका पल में रूठना पल में मुस्काना क्यों मायूसी सा घर अंदर लगता है। देकर आस दिलासा दिल को सम्हालें, नाज़ुक दिल ढ़लते पत्थर सा लगता है। उसका घर से आनंद इस कदर जाना, अब खिलता गुलशन भी जंगल लगता है।

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