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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 68, सितंबर(प्रथम), 2019

दोहे

राजपाल सिंह गुलिया

1. गर ना माने बात को , मन चंचल नादान ! अंकुश रखना साथ में , कहें जिसे सब ज्ञान !! 2. अपना भारत देश ये , बने जगत सिरमौर ! बस इतनी सी कामना , चाह नहीं कुछ और !! 3. बातें माने ग़ैर की , खुद में नहीं विवेक ! ऐसे मूरख लोग भी , मिलते यहाँ अनेक !! 4. पाँव नहीं हैं झूठ के , कहता ये संसार ! लेकिन फिर भी दौड़ में , सच जाता है हार !! 4. बदल बदल कर दल यहाँ , खोते नेता मान ! दौड़े गाड़ी संग में , जैसे कोई श्वान !! 5. बो कर खुश था बागवाँ , बगिया में विषबेल ! फली बेल के अब वही , दंश रहा है झेल !! 6. खाना घर को देख कर , कमा पड़ौसी देख ! बदलेगी फिर देखना , तेरी करतल रेख !! 7. सचमुच अब तो देश से , गया राम का राज ! सहमी सी हैं जानकी , फिरें दशानन आज !! 8 . घोल दिए हैं वात में , हमने कितने रोग ! फिरे वही ये बाँटती , फिर काहे का सोग !! 9. ऐब यही बस आप में , झूठा भरा ग़रूर ! मैं तो हूँ इक आइना , कर दो चकनाचूर !! 10. जाट कहे सुन जाटनी , है खतरे में पाग ! टीवी भी सिखला रहा , अच्छे होते दाग !!

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