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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

स्कूल का पहला दिन

डॉ. ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता

बात तब की है जब मैं स्कूल में पढ़ती थी। याद है आज भी मेरे घर से स्कूल बहुत दूर था। लगभग 5-6 किमी. दूर। बनारस शहर में उस वक्त गाड़ियों की आवाजाही कम ही थी। स्कूल बसें भी सीमित। सरकारी स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय, बी.एच.यू. की बात अपनी ही थी। मुझे आज भी याद है अपना पहला दिन स्कूल का (पता नहीं कैसे याद है), मम्मी मुझे लेकर स्कूल दिखाने गयी थी। क्लास की पहचान कराने के लिए स्कूल में प्रवेश करते ही उन्होंने दाहिनी तरफ दिखाया कि देखो यहाँ नल है इससे आगे सीधे-सीधे पार्क से होते हुए तुम्हें आगे बढ़ना होगा। पार्क में माँ सरस्वती की मूर्ति है, उन्हें प्रणाम रोज करना फिर सामने प्राचार्य, उपप्राचार्य का कक्ष और स्टाफ रूम है कोई परेशानी लगे यहाँ खड़े हो जाना। (आज के मेरे जैसे अभिभावकों की तरह नहीं जो बच्चों को उँगली पकड़ के क्लास के अंदर तक छोड़ के आया करते हैं और घंटा भर बाहर खड़े होकर 1 घंटा इंतज़ार करते हैं कि अगर बच्चा रो रहा हो तो अभी वापस ले जाती हूँ, मैं क्लास 1 की बात कर रही हूँ।)

खैर आगे बढ़ी तो सामने प्राइमरी सेक्शन दिखाई पड़ रहा था साथ में हेडमास्टर सर का रूप जो कद में बहुत लंबे और बहुत गोरे थे। माथे पर हमेशा लाल टीका लगाए छवि ऐसी कि देख कर ही सहम जाएँ। वैसे मम्मी याद रखने के तरीके मुझे समझाए जा रही थी उनके कक्ष के बगल में पीने के पानी का नल था, वहीं से गिनाना शुरु किया कि इस जगह से पहला रूम सर का, दूसरा रूम 1A, तीसरा 1B यही तुम्हारी Class है। मैं भी रट्टू तोते की तरह रटने लगी और कहा याद हो गया। (शायद कुछ ज्यादा ही स्मार्ट थी मैं) अगले दिन मुझे अपने पुराने स्कूल के रिक्शे वाले के साथ अकेले स्कूल आना था जिनका नाम छेदीलाल था। मम्मी ने प्यार से समझाया और कहा याद है न? मैंने कहा हाँ-हाँ याद है। बड़ा मजे का समय था गद्दी वाले रिक्शे पर आराम से बहुत दिनों बाद नई यूनिफार्म पहन कर अकेले बैठने को मिला वरना तो एक गद्दी (रिक्शे की गद्दी) पर तीन बच्चों को बिठाया जाता था। हम लड़ते रहते इधर हो, उधर हो। आज अकेले बैठी तो लगातार मैं फिसल-फिसल कर ऊपर उठ रही थी। खैर मज़े से रास्ता देखते हुए जा रही थी। बोर्ड पढ़ने की आदत थी मिला-मिला के पढ़ लेती थी। रास्ता देखते हुए अकेले जाने का आनंद ही आज कुछ और था। (गोदौलिया से रेवडी तालाब, भले पर, दुर्गा कुंड, संकट मोचन, लंका तक सीधा रास्ता) उसके बाद महामना की पावन भूमि का विशाल प्रवेश द्वार जहाँ अंदर जाने से पहले आज भी महामना की मूर्ति को नमन करके ही प्रवेश करती हूँ। उसके बाद अंदर तो कुछ समझ में आया नहीं बस इतना याद था गेट से दाहिने जाकर सीधे चलते जाना है पर बिड़ला हॉस्टल का गेट कल ही पढ़ लिया था और याद रहा वहाँ से दाएँ - सीधे और अंत के मोड़ से पहले मोड़ पर स्कूल है पहले छोटा स्कूल (मालवीय शिशु विहार) उससे सटी मेरे स्कूल की दीवार।

स्कूल आते ही फुर्र से उतर कर छेदी अंकल को कहा आप जाइये मैं अंदर चली जाऊँगी, मम्मी ने बताया है। उनको भी दूसरे स्कूल के बच्चे छोड़ने जाना था, अपने घर से लकड़ी की बेंच को रिक्शे पर बाँधना होता था, समय लगता इसलिए वो चले गए। उसी रास्ते चुपचाप आगे कल की छवि याद करते-करते बढ़ी, माँ सरस्वती की मूर्ति को नमन किया और सामने से तीसरा कमरा याद कर अपना एल्मूनियम का बक्सा खाली सीट पर रख दिया और चुपचाप बैठ गयी। तभी वहाँ कोई आया और कहा कि चलो प्रेयर करने फील्ड में जाना है, मैं हैरान उनके साथ-साथ चलने लगी, आँखें भौंचक्क, सारी क्लास एक जैसी, बाएँ तरफ एक स्टेज देखा वहाँ से अध्यापक अंदर की तरफ जा रहे थे। मैं बाहर की तरफ से गयी और मुझे सेक्शन पूछ कर जल्दी में लाइन में खड़ा किया, सब अनजान। क्या हुआ वहाँ, कैसे हुआ ये तो कुछ याद नहीं। आँख बंद कर करने को कहा होगा तो कर ली होगी साथ ही लिपसिंग की प्रार्थना की। (दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना) उसके बाद प्रतिज्ञा, राष्ट्रगान और वापस क्लास में जाने की लाइन ऐसे बनी जैसे सबको एक-दूसरे की पूंछ पकड़ के चलना हो। खैर मैं भी बढ़ गयी, सब बड़ा अजीब था। (याद कैसे है ये मैं अब तक नहीं जानती) मैं मम्मी के शब्द याद करते हुए 1, 2, 3 अपनी क्लास में गयी पूरे विश्वास के साथ देखा तो वहाँ से मेरा बक्सा गायब था। उस समय हमें बस्ता नहीं दिया गया था। अब तो जो मैंने रोना शुरु किया कि मुझे भी पता नहीं, खूब रोई सब नए-नए दोस्त आए बोले क्या हुआ मैंने कहा मेरा बक्सा चोरी हो गया। अब बहुत डाँट पड़ेगी घर पर। सब अनजाने दोस्त लड़के-लड़की मेरा बक्सा ढूँढने में लग गए ओर मेरा रोना और चालू यह कह-कह कर कि दूसरी सीट पर ही रखा था कौन ले गया, खोज तो रही नहीं थी बस रोये जाऊँ। अच्छा तभी किसी लड़के ने पूछा कि तुम कौन सी क्लास में हो मैंने कहा 1-B तभी सब खूब हँसे (इसलिए कि मैंने स्कूल देर से ज्वाइन किया था वो सब 8-9 दिन से आ रहे थे। मुझे तीन-चार बच्चों ने पकड़ा और कहा उठो और चलो मुझे गुस्सा आ रहा था) सब पकड़ के अगली वाली क्लास में दूसरी सीट पर खड़ा करके कहा लो यही है न तुम्हारा बक्सा तब मेरी समझ में आया कि बड़े विश्वास के साथ भरी मैं तीसरे नहीं चैथे कमरे 1-C में अपना बक्सा खोज रही थी। हम सब खूब हँसे। पर वो सब मेरी मूर्खता पर हँस रहे थे। कुछ शुरु भी नहीं हुआ और क्लास में कोई टीचर आए और बोले छुटटी हो गई। अब तो मेरी हालत खराब हुई, कुछ समझ नहीं आया अब क्या करूँ घर पर उस जमाने में फोन भी नहीं हुआ करता था। स्कूल के बाकी रिक्शे वाले बाहर खड़े थे, मेरे तो जा चुके थे। अब क्या करूँ। इतनी हिम्मत भी नहीं कि किसी से कैसे कहूँ। आज के समय के तरह स्कूल नहीं था वो। बच्चे अपने आप बाहर निकलने लगे कोई टीचर नहीं था देखने वाला क्योंकि आकस्मिक किसी अध्यापक की सुबह मृत्यु हो गई थी। सब वहाँ जाने की तैयारी में हों शायद। अब हिम्मत दिखा के बाहर निकली पर जाती तो कैसे और किसके साथ। स्कूल से लगी पुलिया पर बैठ गई। एक-एक करके बच्चे जाने लगे थे। अब रोने का गुबार पनपने लगा था और कुछ ही सेकेंड में फूट पड़ा और कोई आया चुप कराने। तभी दो बच्चे अपने रिक्शे वाले के साथ आए बोले क्या हुआ, क्यों रो रही हो। मुझसे कुछ कहा तो जा नहीं रहा था। सिसकते बोली मेरा रिक्शा वाला नहीं है। छुट्टी हो गई। घर बहुत दूर है और महारोना चालू। तभी बड़े प्यार से रिक्शे वाले ने पूछा कि कहाँ घर है, स्मार्ट बच्ची थी मैं घर का पता तो याद था नहीं एरिया पता था और लोकेशन, कहा कि गोदौलिया पर है, उसने पूछा बड़ी गोदौलिया या छोटी गोदौलिया अब मुझे क्या पता बड़ा और छोटा क्या। कहा पेट्रोल पंप वाली बस ये पता है। वैसे तो बड़ी ही मूर्खता का काम था बिना स्कूल में बताए मैं उसके रिक्शे में बैठ गई, डर बहुत लग रहा था। मैंने तो डर के मारे पैसे भी नहीं पूछे थे। बस चल पड़ी। न जाने क्या दिन था वो कुछ बहुत बुरा भी हो सकता था पर हुआ नहीं। जैसे-जैसे आई वैसे-वैसे सारा ध्यान रास्ते पर लगा रहा बस इतना याद था बड़ा गेट B.H.U. का आते ही बायें से सीधे जाना है (अस्सी वाली तरफ से नहीं) रास्ता जाना-पहचाना और वही बोर्ड दिखने लगे जो कल और सुबह देखे थे सोचा था जरा भी इधर-उधर हुआ तो खूब चिल्लाऊँगीं (इतनी बुद्धि थी मुझे) खैर, डर-डर के गोदौलिया आ ही गया सब परिचित सा दिखने लगा, जान में जान आई, तभी वह पूछा अब कहाँ मुझे वहाँ से सब याद था जैसे ही गीता मंदिर गेट आया मैं बोली गली में अंदर ले लो। गली-मुहल्ले के सभी लोग जानते थे, गलियों में तो हम अकेले टाफियाँ लेने भाग के चले जाते थे वहाँ अब कोई डर न था। डर था अब घर पहुँच के अपनी कलाकारी कैसे बयाँ करूँगी। शायद 10 या 10:30 बज गए होंगे कैसे करके घर पहुँची, घंटी बजाई। मम्मी डिपार्टमेंट जाने के लिए निकल ही रही थी, मुझे देखकर दंग रह गयी, बोली क्या हुआ, कैसे आई, सवालों की झड़ी लग गयी और फिर क्या मैं तो सहम गयी तब तक रिक्शा वाला गा गया और उसने सारी कथा-कहानी मम्मी को सुना दी। मैंने डरते हुए कहा मम्मी इन भइया को 5 रुपये देने होंगे (5 रुपये बहुत होते थे उस समय वही किराया था BHU से गोदौलिया का) वो देने पड़ेंगे मेरे जल्दी आने से लगा था आज तो मम्मी-पापा बहुत डाँटेंगे। अरे, डाँटना क्या था पड़ा एक गाल पर जोरदार चाँटा फिर क्या था मैं सन्न। अब तो न रोना था न धोना।

मुझे घर के अंदर जाने का कहकर जल्दी से कुछ लेने गयी क्या मुझे नहीं पता। पैसे लेने तो नहीं गई थी पर्स तो हाथ में ही था मैं भी चुपचाप देखने लगी। जल्दी से गुड़ की डेली पानी के साथ लेकर आयी बोली भैया आज तो तुमने हमारी लाज रख ली किन शब्दों में तुम्हें धन्यवाद कहूँ 10 रुपये का नोट देकर विदा किया। मेरी समझ में तो कुछ आया ही नहीं ये मुझे तो ज़रा भी शाबाशी नहीं दी गयी उस पर मारा डाँटा अलग से। शाम को मेरी क्लास लगी और बताया ऐसे करना कितना गलत है, क्या हो सकता था, न जाने कितने तरह के उदाहरण दिये गये। मैं चुप सब सुनती रही। तभी कहा समझ में आया या नहीं? ठंडी सांस भरकर कहा समझ में आ गया। पर ऐसा सब हुआ तो नहीं न देखा मैं कितनी हिम्मती हूँ। आज भी कई बार ये किस्सा मज़े लेकर सुनाया जाता है। अब लगता है वास्तव में सब शायद डरावना था।


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