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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

जीवन के कटु से यथार्थ से मुठभेड़ करता ‘डांग’

राघवेन्द्र रावत

पिछले दिनों हरिराम मीणा का नया उपन्यास ‘डांग ‘ राजपाल एंड सन्ज़ प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है | उपन्यास के कवर पेज पर ही डूंगर ,डंगर और डाकुओं की पृष्ठभूमि पर आधारित होना अंकित किया गया है | कविताई से गद्य की ओर अग्रसर होते हुए हरिराम मीणा ने उपन्यास ‘धूणी तपे तीर ‘ से प्रमुखता से दस्तक दी | इससे पहले उनकी ‘भीलनी’ नामक लम्बी कविता बहुत चर्चित रही थी लेकिन ‘धूणी तपे तीर ‘ उपन्यास ने उन्हें हिंदी साहित्य में एक मुकाम हासिल करने में बहुत मदद की | आदिवासी समुदाय द्वारा दक्षिणी राजस्थान के मानगढ़ में अंग्रेजों और तत्कालीन सामंतों के खिलाफ़ लड़ते हुए पंद्रह सौ आदिवासियों द्वारा किए गए बलिदान की घटना को उपन्यास के ताने -बाने में बुना गया है | हरिराम मीणा ने आदिवासी जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विशद कार्य किया है लेकिन यह उपन्यास नितांत अलग भोगोलिक परिवेश, जीवन और सांस्कृतिक परिद्रश्य से हमें रूबरू कराता है |

राजस्थान ,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा के पठारी और बीहड़ क्षेत्र को ‘डांग ‘ के नाम से जाना जाता है जिसका क्षेत्रफल अनुमानित आठ हजार वर्ग किलोमीटर है | हरिराम मीणा न केवल इसी अंचल से आते हैं बल्कि पुलिस विभाग में नौकरी करते हुए पूरे ‘डांग ‘ क्षेत्र के सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को भी उन्होंने बहुत करीब से देखा है | उस अंचल के बुनियादी सरोकार, वहां की संस्कृति और दुखों से साक्षात्कार करते हुए अपनी अनुभूतियों का हिस्सा बनाया है | डांग क्षेत्र में दो संस्कृतियाँ एक साथ घुली मिली रहती आई हैं | एक है बुन्देलखंडी और दूसरी है ब्रज संस्कृति | आगरा से आगे भिंड ,मुरैना ,ग्वालियर और ओरिया का इलाका बुन्देलखंडी संस्कृति का क्षेत्र है वहीँ भरतपुर, धौलपुर, करौली और आगरा के आस -पास ब्रज संस्कृति देखी जा सकती है |

उपन्यास का केन्द्रीय कथानक दस्यु समस्या है | इस पर केन्द्रित जो अन्य किताबें हैं वे किसी एक डाकू को नायक मान कर लिखी गयी किताबें हैं, इनमें से ज्यादातर पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी | सबसे ज्यादा पुस्तकें फूलन देवी के बारे में लिखी गयी क्योंकि वह महिला बागी थी तथा सामान्य मल्लाह परिवार की दमित स्त्री से बागी और बागी से राजनेता तक का सफ़र उसे विशिष्ट बनाता है | इन पुस्तकों में ‘टेल्स ऑफ़ मानसिंह (केनेथ एंडरसन ,1961), ‘द प्रोब्लेम्स ऑफ़ डकोयईटी एंड द चम्बल वैली (दत्तात्रेय प्रभाकर ,1980), ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ फूलन देवी ( मैरी थरेसे एंड पॉल राम्बली ,1997) आदि प्रमुख हैं | सुजीत सराफ द्वारा लिखित पुस्तक ही एक अंग्रेजी उपन्यास के रूप में है | ‘डांग ‘ से पहले हिंदी में ऐसा उपन्यास जो न केवल दस्यु समस्या बल्कि डांग के जीवन की विषमताओं और विसंगतियों को समग्रता में रेखांकित करता हो ,दूसरा दिखाई नहीं देता |

उपन्यास के काल खंड को विस्तार देने में सूत्रधार हरजीनाथ जोगी की बड़ी भूमिका है | हरजीनाथ के किस्सागोई और गायन से शुरू हुआ उपन्यास हरजीनाथ की चम्बल नदी में जल समाधि के साथ ही पूर्ण होता है | आज़ादी के पूर्व से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक का काल खंड उपन्यास का है | सुल्ताना डाकू और डाकू मान सिंह राठौर अपने क्षेत्र में अपने मानवीय सरोकारों के कारण नायक थे | मान सिंह राठौर को भारतीय “रोबिन हुड” कहा गया है | क्योंकि कहते हैं मान सिंह अमीरों को लूटता था और गरीबों की मदद करता था | यही कारण था की आम जनता की सहानुभूति मान सिंह राठौर के साथ थी | तभी उत्तर भारत में सुल्ताना डाकू और मान सिंह राठौर की जीवनी पर आधारित नौटंकियाँ बहुत लोकप्रिय थीं | बाद में फूलन देवी ने भी बाल विवाह और कम उम्र की लड़कियों के विवाह अधेड़ उम्र लोगों से करने के वालों को मौत के घाट उतारा | यह एक समाज सुधारने की कोशिश थी ,लेकिन बेहमई काण्ड में निर्दोष लोगों की हत्या ने उसे नायिका नहीं बनने दिया | फूलन को डाकू बनाने में उसकी बालपन में पुत्ती लाल जैसे व्यक्ति से शादी और पुत्ती लाल द्वारा उस पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार करना एक बुनियादी कारण रहा था | जिसने आक्रोश के अंकुरों को जन्म दिया जो श्रीराम और लालाराम के अत्याचार के बाद बेहमई काण्ड के रूप में प्रस्फुटित हुए | याद कीजिए जब ‘बैंडिट कुवीन ‘फिल्म का एक पात्र कहता है कि ‘ सरपट के फूल बारूद की तरह ज्वलनशील होते हैं |’ अगर पान सिंह तोमर और फूलन के जीवन को उदाहरण के तौर पर देखें तो हरिराम मीणा का कथन सत्य प्रतीत होता है | पान सिंह तोमर सेना में सुबेदार था ,और एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक विजेता था | उसके ताऊ के लड़कों द्वारा उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेना और उसके बाद पुलिस प्रशासन द्वारा उसकी मदद न करने की घटना ने उसकी देश भक्ति की भावना को आहत कर दिया था |पुलिस के पास शिकायत मात्र से चिढ़ कर विरोधियों ने उसके बेटे को घायल कर दिया तथा उसकी माँ को बन्दूक के बट से मार कर मौत के घाट उतार दिया | इस पूरे घटना क्रम ने व्यवस्था के प्रति उसके विश्वास को खत्म कर दिया और बदला लेने के लिए चम्बल की घाटी का सहारा लिया | शनै -शनै ताकतवर होने के साथ- साथ नायकत्व प्राप्त होने को हरिराम मीणा भौतिक विवशता कहते हैं | मीणा जी लुक्का ,बाबू गुर्जर व् अन्य कई डाकुओं के रोचक, स्याह और सफ़ेद जीवन प्रसंगों से स्त्रियों की खरीद फरोख्त ,गरीबी और वर्ग भेद जैसी समस्याएं से रूबरू कराते हैं |

इसमें कोई दो राय नहीं कि पुलिस कानून व्यवस्था की एक बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह करती है तदुपरांत भी समाज में पुलिस की छवि अच्छी नहीं है | एक संवेदनशील पुलिस अधिकारी और ख़ास कर लेखक -पुलिस अधिकारी के लिए निश्चित रूप से बेचैन करने वाली बात हो सकती है | ‘डांग ‘ उपन्यास को लिखने के पीछे यह एक मनोवैज्ञानिक दबाब रहा होगा या उत्प्रेरक | डांग के सुखों -दुखों की तह में जाकर उनके कारणों की गहन पड़ताल से आगे जाकर समस्यायों के निराकरण के सुझाव भी अपने अनुभव से देते हैं | एक लेखक से अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह निराकरण भी प्रस्तुत करे क्योंकि कथाकार यथार्थ को कलात्मकता के साथ एक निश्चित शिल्प में ढाल कर प्रस्तुत कर सकता है | वह कोई समाज शास्त्री नहीं है जो समाज में व्याप्त शोषण और विसंगतियों को दूर करने के विकल्प सुझाये |

डांग क्षेत्र में बागी होने की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि की चर्चा करते हुए लेखक कहता है कि “ इस अंचल के ग्रामीण दुर्भाग्यशाली |उनका जीवन बहुत कठिन | पहाड़ी -पठारी अंचल में थोड़ी बहुत खेती- बाड़ी या पत्थर खानियाँ मजदूरी | चोरी डकैती किसी की आदत में नहीं |ऐसे कर्म को आर्थिक दबाव का धंधा अवश्य कहा जा सकता था ,जिसे कोई मजबूरी में ही अपनाता , जो बाद में खतरनाक बन जाती थी | “

मुक्तिबोध ने महाजनी सभ्यता के दबाब और घिराव में छटपटाते मनुष्य की व्यथा को ‘चम्बल की घाटी‘ कविता में विश्व बोद्ध के साथ एक रूपक की तरह रखा है | मुक्ति बोध ने कहा था कि “मेरे युगीन अनुभव की कन्या है, और उस कन्या का ‘अँधेरे में’ ,’चम्बल की घाटी में’ अपना नाम है ,अपना स्वतंत्र विकासमान व्यक्तित्व है | “

हरिराम मीणा ने उपन्यास में अपना फोकस डांग के उस क्षेत्र पर रखा है जो उनके अनुभव संसार का हिस्सा रहा है ,शेष अन्य स्रोतों से प्राप्त तथ्यों को उपन्यास में समाहित कर लिया है | वे उपन्यास में वर्णित काल खंड में हुए राजनीतिक , भौतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को भी साथ साथ रेखांकित करते हुए चलते हैं यानी विभिन्न धाराओं को एक बड़ी धारा में बदलने का सार्थक प्रयास हमें दिखाई पड़ता है | लेखक ने डांग क्षेत्र के लोगों की मानसिकता को उद्घाटित करती वाचिक परम्परा के महाकाव्य ‘आल्हा ऊदल ‘ से उठाई गई इस कहावत का उल्लेख किया है –“ जा को बैरी सुख सूं सोवै बाकू जीबे को धिक्कार |“ प्रश्न फूलन और पान सिंह तोमर का नहीं है ,जब किसी तरह न्याय नहीं मिलता तो व्यक्ति विवेक हीनता में ऐसे कदम उठा लेने के लिए मजबूर होता है | यानी नाकाम व्यवस्था से उपजती हताशा के कारण ही कोई मजबूरन बीहड़ों का रुख करता है |

हरजीनाथ मेले व् अन्य घटनाओं क्र जरिये लोक संस्कृति से हमें परिचित कराते हैं | आल्हा -ऊदल ,भृतहरि की कथा और लांगुरिया इसके उदाहरण हैं जिनकी विस्तृत विवेचना कथा सूत्र में पिरोते हुए हरजी नाथ करते हैं |

डांग ही नहीं वरन पूर्वी राजस्थान में एक गायन कला बहु प्रचलित है ,वह है लांगुरिया | कैला देवी के मंदिरों में विशेष कर नव रात्रि के दिनों में लांगुरिया की धूम मचती हुई देखी जा सकती है | अर्जुन कवि का उल्लेख वरिष्ठ आलोचक शंभू गुप्त ने किया था ,हरि राम मीणा भी अर्जुन कवि के दोहों की जन स्वीकारता का जिक्र करते हैं | हरजीनाथ मेले व् अन्य घटनाओं के जरिये लोक संस्कृति से हमें परिचित कराते हैं | नदियों को पोरोणिक कथाओं और महाकाव्यों के सन्दर्भों के माध्यम से जिस प्रकार बहुत शोध पूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया गया है, वह अनूठा है | महाभारत से द्रौपदी और श्रवण कुमार के प्रसंग चम्बल नदी की प्रकृति को हमें बताते हैं | बिहार की नदियों के बारे में हवलदार त्रिपाठी द्वारा बहुत आत्मीयता से वर्णन किया गया है | जिस तरह हवलदार त्रिपाठी बिहार की नदियों के मर्म को जानते थे या रसूल हमज़ातोव दागिस्तान को समझते थे ,ठीक उसी तरह हरिराम मीणा ‘डांग ‘ को समझाने का प्रयास करते दिखते हैं | प्रकृति का ऐसा चित्रण बिना सूक्ष्म अवलोकन के संभव ही नहीं है | बांध बारेठा को अतीत की गलियों से निकाल कर वर्तमान के पटल तक लाकर उसके वैभव से उजाड़ होने की कथा पाठक को बेचैन करने वाली है | जामुन, गूलर, लहेसुआ ,इमली और केवड़े के झुरमुट जो पूरे वितान को सुगन्धित करते थे, जंगली जानवर, पक्षी आदि सब गायब हैं | उससे भी ज्यादा तकलीफदेह यह है कि विभिन्न जातियों के बीच की समरसता भी लुप्त हो गयी है | राज शाही के समय आखेट और विचरण का सुरम्य स्थान और पक्षियों की किलकारी के गुंजायमान बाँध बरेठा जो कभी दस्युओं की शरणगाह बना रहता था अब सन्नाटे और भय की गिरफ्त में है | बांध बारेठा के जरिए लेखक ने इस भूभाग में हुए भौतिक परिवर्तनों को ही नहीं बल्कि जीवन की टूटती हुई धडकनों को गहराई से महसूस किया है | दस्यु जीवन छोड़ने के बाद कितना दस्यु शेष रहता और कितना मनुष्य यह एक विचारणीय प्रश्न मीणा जी हमारे सामने रखते हैं |

यहाँ एक बात मैं और जोड़ना चाहता हूँ कि डांग क्षेत्र का लाल और हल्का गुलाबी बलुआ पत्थर पूरे भारत की विशिष्ट इमारतों में लगा है फिर खनिज संपदा से लबरेज इलाका भय और दरिंदगी का प्रतीक पर्याय कैसे बन गया, यह सोचने वाली बात है | उन्होंने फिल्मों में दस्युओं के जीवन को गलत ढंग से चित्रित करने पर भी वाजिब सवाल उठाया है | स्वयं फूलन देवी ने ‘बैंडिट क्वीन’ में फूलन के चरित्र चित्रण को लेकर नाराजगी व्यक्त की थी | फिल्में तो बहुत बनी लेकिन गंगा ज़मुना, पान सिंह तोमर ,और बैंडिट कुवीन के अलावा किसी ने दस्यु जीवन के यथार्थ को सही ढंग से चित्रित नहीं किया |

धौलपुर क्षेत्र के तीन राजनीतिक परिवारों के वर्चस्व और अपराधियों से गठजोड़ किसी से छुपा नहीं है | लेकिन साथ- साथ पनपते हुए खान माफिया और बजरी माफिया की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं | करवी में खान माफिया द्वारा ग़रीब नाबालिग लड़कियों को खानों में काम के बदले देह शोषण का प्रकरण पिछले दिनों उजागर हो चुका है | हरिराम मीणा इस अंचल से जुड़े हर जरूरी सवाल से मुठभेड़ करते हैं | जातीय वर्चस्व की समस्या राजस्थान में मीणा गुर्जर जातियों के बीच बहुत गंभीर रूप में उभर कर आई है | उसके कारणों का खुलासा भी मीणा जी अपने उपन्यास ‘डांग’ में करते हैं | पिछले तीस वर्षों में पर्यटन और विकास के बहुत काम हुए हैं लेकिन बेरोजगारी और जाति भेद की समस्या पर अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है |

उपन्यास का एक मजबूत पक्ष भाषा भी है जो परिवेश को प्रामाणिक और जीवंत बनाती है | दो बातें जिनकी ओर मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा | एक तो जो संस्मरण ‘खाकी में कलमकार ‘ पुस्तक में भी संकलित हैं ,उनका इस पुस्तक में पुनर्लेखन तथा जो डांग की समस्याओं के निराकरण के उपाय बताये गए हैं उनका संक्षिप्तीकरण किया जाता तो बेहतर होता | संस्मरणों पर आधारित कृति में व्यक्तिपरक होने का खतरा होता है, उससे बचते हुए हरिराम मीणा ने एक सराहनीय सृजन किया है |


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