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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

चालाकियाँ इंसान की

आकाश महेशपुरी

हम समझ पाते नहीं चालाकियाँ इंसान की हो गयी बंजर जमीं अब दोस्तों ईमान की लाख सिक्के ले के आओ मामला गंभीर है इस तरह कुछ डॉक्टर कीमत लगाते जान की अनसुनी करते हैं बातें जो अगर निर्धन कहे गौर से सुनते मगर सब लोग क्यों धनवान की देखकर भूखा उसे मुझको तजुर्बा हो गया होशियारी छीन लेती रोटियाँ नादान की गाँव में भूखा न सोता अजनबी बंदा मगर देख लेना तुम शहर में बेबसी अनजान की ठोकरें 'आकाश' मैं खाता रहा हूँ रात-दिन कद्र दुनिया में कहाँ है फालतू सामान की

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