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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

पथ प्रदर्शक - महर्षी दयानंद सरस्वती(1824- 1883)

डाॅ रानू मुखर्जी



शिक्षण कार्य को एक पवित्र कार्य माना गया है।ज्ञान दान सर्वश्रेष्ठ दान है।शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक और शिक्षार्थी की अहम भूमिका होती है। शिक्षक एक मार्गदर्शक , प्रेरक , आदर्श अभिभावक होता है। शिक्षक एक ऐसा अश्त्र और शसत्र है जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन में विजय और सफलता के सोपान को प्राप्त कर सकता है। आज मैं एक ऐसे महामानव को स्मरण और नमन करने जा रही हूँ जिनके मार्ग दर्शन ने न केवल भारतीय संस्कृतिक के प्रति लोगो को जागरूक बनाया अपितु राष्ट्रभक्ति को भी सशक्त किया।

आधुनिक भारत के महान चिंतक , अखंड ब्रह्मचारी तथा आर्य समाज के संस्थापक "महर्षी दयानंद सरस्वती" । देश उन्हे एक समाज सुधारक , राष्ट्र निर्माता, प्रकाण्ड विद्वान, ओजस्वी संत और स्वराज के संस्थापक के रूप में जानता है। इनका जन्म गुजरात के टंकार में 12 फरवरी 1824 को हुआ। उनका नाम मूलशंकर तिवारी था। बचपन से ही वेद उपनिषदों के प्रति रुचि होने के कारण उन्होने इन पर गहन अध्ययन किया। वेदों का भाष्य करने के कारण उन्हे " ॠषि" कहा जाता है क्योकि "ऋषयो मंत्र दृष्टार" ( वेद मंत्रों के अर्थ का दृष्टा ऋषी होता है) । अपने गुरू विरजानंद की आज्ञा से दयानंद सरस्वती ने वेद - शास्त्रों के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान , योग , हवन , तप और ब्रह्मचर्य को शिक्षा का माध्यम बनाया। उन्होने " वेदों की ओर लौटो " मंत्र को ज्ञान समृद्धि और मोक्ष का मार्ग बताया।

1874 मे उन्होने अपना कालजयी ग्रंथ " सत्यार्थ प्रकाश " की रचना की। इसके महत्व को समझते हुए 1908 मे इसका अंग्रेजी में अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। उन्होने " ॠग्वेदी भाष्य भूमिका " , " संस्कार विधि", " आर्याभिविनय" आदि विशिष्ट ग्रथों की रचना की जो हमारे मार्ग दर्शक हैं। इसके साथ ही " आर्याद्येश्यरत्नमाला " , " गोकरूणानिधि" , " व्यवहारभानू " , " पंचमहायज्ञ विधि" आदि अनेक महान ग्रथों की रचना की जो हमारे संस्कार संस्कृति को जन - जन तक पहुंचाकर लोगो को शिक्षित करने का कार्य करतें हैं। विद्वानो के अनुसार कुल मिलाकर उन्होने 60 पुस्तकें , 14 संग्रह, 6 वेदांग, अष्टाध्यायी टीका और अनगीनत लेख लिखे। महर्षि दयानंद सरस्वती ऐसे पहले महामानव हैं जिन्होने वेदों को सत्य विद्याओं की पुस्तक कहा ही नहीं सिद्ध भी किया । उनका कहना है कि ईश्वर और उनका दिव्यज्ञान ही वेद हैं ।ज्ञान - विज्ञान का मूल स्रोत सर्वज्ञ ईश्वर का दिया हुआ वेद ज्ञान है। उन्होने जीवन भर वेदों और उपनिषदों का पाठ किया और संसार के लोगों को उस ज्ञान से लाभान्वित भी किया। मूर्ति पूजा को व्यर्थ बताया।

स्वदेशी आंदोलन के मूल सूत्रधार भी महर्षी दयानंद सरस्वती ही थे। 1876 मे उन्होने सर्वप्रथम स्वराज का संदेश दिया " भारतवर्ष भारतियों का है। " इसे बाद मे बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया और " स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" का नारा लगाया। महात्मा गांधी जी भी इनके विचारों से प्रभावित थे। स्वाधिनता के इतिहास में जितने भी आन्दोलन हुए उनके बीज महर्षी अपने अमर ग्रंथ " सत्यार्थ प्रकाश " के माध्यम से डाल गए थे। यह ग्रंथ न जाने कितने क्रान्तिकारियों का प्रेरणास्रोत रहा। उस समय के महानवीर महर्षी से प्रभावित थे । तात्या टोपे , नाना साहेब पेशवा, दादा भाई नौरोजी , श्यामली कृष्ण वर्मा, लाला लाजपत राय , वीर सावरकर आदि न जाने कितने बलिदानी " सत्यार्थ प्रकाश" ने पैदा किए। सत्यार्थ प्रकाश को अंग्रेजी साम्राज्य की जडें खोखली करनेवाला ग्रंथ कहा जाता है। स्वराज और स्वतंत्रता की मूल अवधारणा हमे उन्ही से प्राप्त हुई।

1857 की क्रांति में भी दयानंद सरस्वती जी का बहुत बडा योगदान रहा।

उन्होने अंध विश्वासों का विरोध किया , बाल विवाह का विरोध किया, सती प्रथा का विरोध किया, विधवा विवाह का समर्थन किया, एकता का संदेश दिया , वर्ण भेद का विरोध किया , स्री शिक्षा एवं समानता का प्रचार प्रसार किया । 1875 में " गुडी पडवा " के दिन मुंबई मे " आर्य समाज " की स्थापना की। आर्य समाज का मुख्य धर्म मानव धर्म ही है। महर्षी दयानंद जी, केशव चन्द्र सेन से कोलकाता में मिले उन्होने महर्षी को परामर्श दिया कि " आप अपना व्याख्यान संस्कृत मे न देकर आर्य भाषा अर्थात हिन्दी में दें । जिससे विद्वानों के साथ साथ साधारण मनुष्य तक भी आपके विचार आसानी से पहुंच सके।" 1862 से दयानंद सरस्वती जी ने हिन्दी मे बोलना प्रारंभ किया और हिन्दी को देश की मातृ भाषा बनाने का संकल्प लिया। उनकी मृत्यु 30 नवम्बर 1883 को हुई।

आज हमे महर्षी दयानंद सरस्वती जैसे पथप्रदर्शक की आवश्यकता है । उनको शत शत नमन ।


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