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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

ब्रह्म और जगत

मनप्रीत सिंह संधू

ब्रह्म शब्द बृह धातु से बना है जिसका अर्थ है बढ़ना, फैलना, व्यास या विस्तृत होना। ब्रह्म परम तत्व है। ब्रह्म जगत्कारण है, ब्रह्म वह तत्व है जिससे सारा विश्व उत्पन्न होता है जिसमें वह अंत में लीन हो जाता है और जिसमें वह जीवित रहता है। हिन्दू दर्शन पुराण और वेदों में मतभेद ईश्वर के होने या ना होने से नहीं है। मतभेद उनसे साकार या निराकार, सगुण या निर्गुण स्वरूप को लेकर है। फिर भी ईश्वर की सत्ता में सभी विश्वास करते हैं।

ब्रह्म हिन्दू दर्शन में इस पूरे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है। वो दुनिया की आत्मा है, विश्व का कारण है जिससे विश्व की उत्पति होती है, जिसमें विश्व आधारित होता है और अंत में जिसमें विलीन हो जाता है। वह स्वयं ही परमज्ञान है और प्रकाश-स्त्रोत की तरह रोशन है। ब्रह्म निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। मनुष्य का जन्म होता है तो जन्म क्षण में ही उसके हृदय में चैतन्य मन से होते हुए अवचेतन मन से होते हुए मस्तिष्क में चेतना प्रवेश करती है वही आत्मा है और यही आत्मा किसी मनुष्य की मृत्यु हुई थी तो उसकी चेतना अर्थात आत्मा अपने मन से होते हुए अंतर्मन से होते हुए अवचेतन मन से होते हुए चैतन्य मन से होते हुए दूसरे शरीर में अवचेतन मन से होते हुए अंतर्मन से होते हुए मन से होते हुए मस्तिष्क में पहुँचती है यही क्रम हर जन्म में होता है।

जब मानव जागता है तो उसके हृदय से ऊर्जाओं का विखंडन होता जाता है, सबसे पहले हृदय में प्राण शक्ति उत्पन्न होती है जिसे ब्रह्म कहते है। मानव के मस्तिष्क में चेतना उत्पन्न हो जाती है फिर उस चेतना से पंचमहाभूत बनते हैं जिसे ज्योति स्वरूप ब्रह्म कहते हैं। जिससे सम्पूर्ण शरीर के होने का एहसास होता है जिससे मनुष्य कर्म क्रिया प्रतिक्रिया करता है संसार में। ब्रह्म को मन से जानने की कोशिश करने पर मनुष्य योग माया वश उसे परम ब्रह्म की परिकल्पना करता है और उसे संसार में खोजता है। अपर ब्रह्म जो प्राचीन स्थल की मूर्ति है उसे माया वश ब्रह्म समझ लेता है। अगर कहा जाए तो ब्रह्म को जानने की कोशिश करने पर मनुष्य माया वश उसे परमात्मा समझ लेता है।

संस्कृत भाषा में परम सत्य को ‘ब्रह्म’ का नाम दिया गया है। ब्रह्म परम सत्य का साकार रूप है। इस परम संभावना को ग्रहण करने में अगर जरा सी चूक हो जाए, तो फिर भ्रम की स्थिति बन जाती है। इसलिए यह कहा जाता है की अज्ञानता और ज्ञान में बस जरा सा फर्क है।

इसलिए विचारों के भटकाव से बचने के लिए और अपनी राह पर बने रहने के लिए किसी भी तरह के धोखे से बचने के लिए हमें एक ख़ास तरह की अनासक्ति और निष्ठा होनी चाहिए। इसके लिए हमारे अन्दर एक सही तरह का माहौल बनाने में संस्कृति बहुत मदद कर सकती है। संस्कृति का मतलब यही है की- संपूर्ण सृष्टि के प्रति पूरा जुनून, आस-पास के सभी जीवों के प्रति असीम करुणा और खुद को लेकर पूरी तरह से अनासक्ति का भाव होना। परन्तु वर्तमान में इनका उल्टा हो रहा है। वर्तमान में सभी अपने स्वार्थ के लिए काम करते है किसी को संस्कृति के प्रति लगाव नहीं है पहले जैसी वीरता, एकता, भक्ति अब नई पीढ़ी में नहीं है। अब लोगों में खुद के प्रति पूरा जुनून, दूसरों के लिए अनासक्ति और ऊपर वाले के करुणा की उम्मीद करते हैं। यही फर्क है ब्रह्म और भ्रम में। बस थोड़ी सी चूक हुई और समस्या खड़ी हो गई।

अगर हम अपने आस-पास का माहौल सही तरीके से तैयार कर लेते हैं, तो हमें जो दीक्षा दी गयी है हमारे पास जो ज्ञान है वह चाहे कितना भी मामूली क्यों ना हो वह भी बेहतरीन तरीके से काम करेगा। अगर ऐसा नहीं होता तो सही वस्तु भी बुरी होती रहेगी। हो सकता है हम जो कर रहे हैं वह बहुत अच्छा है लेकिन अगर माहौल अच्छा नहीं है तो वह सभ भी व्यर्थ होता रहेगा। इसलिए हमारा कहने का तात्पर्य यही है की सबसे पहले हमें अपने आस-पास के वातावरण को अच्छा बनाना होगा।

ब्रह्म ही इस जगत की निर्मिति का मूल कारण है और वही इसका उपादान कारण भी। इसी की प्रतिक्रिया के रूप में विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत एवं वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत आदि सिद्धांत सामने आये। बनारसी (ब्राह्मण) तप करता है और तीर्थ में मरने के लिए जाता है, परन्तु उससे क्या होता है अवश्मेध यज्ञ किया, दान में सोना दिया, लेकिन रामजी की भक्ति तो डूबकर नहीं की। ओ पाखंडी इन सभ में क्या रखा है, कपट न कर निरन्तर हरि का नाम ले। यही नाम तुझे संसार सागर से पार लगाएगा।

आज के सम्प्रदायग्रस्त युग में ऐसी कृति खोज पाना मुश्किल है, जो सम्प्रदायातीत हो पूर्णत या निरपेक्ष हो और सर्वकालिक गुत्थियों को अत्यधिक विविक्त ढंग से सुलझाकर पाठको को विभोर करने वाली हो। हम सब अपना जीवन या तो यादों में जीते हैं या फिर वादों में। हम दिन और रात औरों पर टिप्पणी करने में लीन रहते हैं। हमें स्वयं अपना निरीक्षण करने का वक्त नहीं है। जबकि होना ऐसा चाहिए की हमें दूसरों पर टिप्पणी करने से पहले अपने आप पर भी चर्चा की जानी चाहिए, अपनी करतूतों पर भी ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में मनुष्य बड़े-बड़े सिद्धांतों पर और बड़ी-बड़ी बातों पर चर्चा अधिक करता है। छोटी-छोटी बुराइयों पर ध्यान कम देता है। दो लोग आपस में मिलते है तो दूसरों की निन्दा शुरू हो जाती है। यही वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या है। आज मानव को अपने जीवन की चिंता कम है लेकिन दूसरे के जीवन की ज्यादा है क्योंकि अपने सुख में वर्तमान मानव सुखी नहीं रहता जितना दूसरों के सुख से दुखी रहता है यह आज के मानव की हीन भावना है जो उसे नीचा दिखाती है। सभी लोग अपने स्वार्थ में लगे हुए हैं किसी को अपने देश या राष्ट्र से कुच्छ लेना देना नहीं है जबकि पहले समय में वीर लोगों ने देश के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए थे, उनके लिए देश ही सब कुछ है। वर्तमान पीढ़ी में यह भावना कम देखने को मिलती है। वर्तमान में यही सबसे बड़ा बदलाव आ चुका है जिसको आज समझने-समझाने की आवश्यकता है तांकि आने वाली पीढ़ी इन बातों से अवगत हो सके और देश प्रेम की भावना उनमें पैदा हो सके।


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