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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

हिन्दी की उपेक्षा- भारतीयों के लिए अभिशाप

अनुश्री 'श्री'

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का यह दोहा मातृभाषा के महत्त्व को समझाने के लिए पूर्णतः सक्षम है। भारतेंदु जी ने इस दोहे के माध्यम से यह बताना चाहा है कि समाज की उन्नति तभी संभव है, जब मातृभाषा की उन्नति हो । मातृभाषा के ज्ञान के बिना तो मन की पीड़ा दूर करना भी कठिन है।

सत्य भी तो है, किसी भी प्रकार के कष्ट का निवारण माँ के पास ही तो होता है किन्तु कभी-कभी वह उपेक्षित भी हो जाती है। 'उपेक्षित' शब्द चाहे माँ के लिए प्रयोग हो या मातृभाषा के लिए, दोनों ही स्थितियाँ संतानों के लिए अभिशाप हैं।

१४ सितम्बर १९४९ को 'हिन्दी' भारत की राजभाषा चुनी गई अर्थात् देश के महत्त्वपूर्ण विभागों में काम - काज की भाषा । इस निर्णय के बाद 'हिन्दी' को प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर १९५३ से पूरे भारत में १४ सितंबर को प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।

हमारे देश को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत कुछ हिन्दी विरोधी गुटों व गैर हिन्दी भाषियों के विरोध के कारण जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना संभव नहीं हो सका, तो इसे राजभाषा घोषित कर दिया गया। राष्ट्रभाषा ना बन पाने के बाद भी हिन्दी अनेक राज्यों की मातृभाषा है किन्तु क्या कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि इतने वर्षों बाद आज भी हमें हिन्दी को प्रसारित करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्योंकि आज भी हमारी मातृभाषा 'हिन्दी' अपनी संतानों से उपेक्षा प्राप्त कर रही है।

गैर हिन्दी भाषी राज्यों में तो वैसे भी हिन्दी का प्रयोग कुछ प्रतिशत तक ही सीमित है ; इसके अतिरिक्त जो हिन्दी भाषी राज्य हैं ,वहाँ भी हिन्दी बोलने वालों की प्रतिशतता कोई अधिक नहीं है । यह तो सर्वविदित है कि पश्चिमी सभ्यता की ओर आकर्षित होते हुए अंग्रेजी को प्राथमिकता देने के क्रम में हम भारतीयों ने हिन्दी को उपेक्षित कर दिया है। मैं यह नहीं कहती कि अंग्रेजी का ज्ञान व्यर्थ है । अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है व प्रत्येक व्यक्ति को इसका ज्ञान अत्यंत आवश्यक है किन्तु क्या पड़ोस की काकी के समक्ष अपनी माँ को उपेक्षित करना उचित है? सम्मान तो दोनों का अत्यंत आवश्यक है किन्तु यदि आप अपनी माँ का सम्मान करने में असमर्थ हैं तो पड़ोस की काकी का सम्मान कैसे कर पायेंगे? मुझे यह देखकर शर्म आती है कि लोग हिन्दी बोलने में शर्म महसूस करते हैं। आज भी उच्च स्तर की बैठकों व पार्टियों में अंग्रेजी को वरीयता दी जाती है, ना कि हिन्दी को। हिन्दी बोलना अब हमारे यहाँ निरक्षरता का प्रतीक माना जाता है। हिन्दी भाषी व्यक्ति को उचित सम्मान ना देकर हिन्दी की ही भाँति उसे भी उपेक्षित किया जाता है। जब मैंने हिन्दी की उपेक्षा का मूल कारण ढूंढने का प्रयास किया तो पाया कि हमारी मातृभाषा 'हिन्दी' की ऐसी स्थिति के लिए हमारे यहाँ के विद्यालयों की एक बड़ी भूमिका है। विद्यालयों में अंग्रेजी इस प्रकार हावी रहती है कि हिन्दी का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता। हिन्दी बोलने के कारण बच्चों को दण्डित करना , अतिरिक्त शुल्क वसूल करना अंग्रेजी माध्यम के सी.बी.एस.ई. विद्यालयों में आम है, जिससे बच्चों के मन में यह बात बैठ जाती है कि हिन्दी बोलना एक अच्छे छात्र के लिए गौरवपूर्ण बात नहीं है। हालांकि नयी शिक्षा नीति संभवतः इस दोष को दूर करने में सफल होगी । नई शिक्षा नीति के अनुसार अब बच्चे प्रथम से पंचम तक की कक्षा या संभवतः अष्टम तक की कक्षा अपनी मातृभाषा के माध्यम में ही ग्रहण करेंगे। इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि यदि आगे की कक्षाओं में भी इसे जारी रखा जाता है तो यह और अच्छा होगा। परंतु आज हमारे भारत में हिन्दी की जो स्थिति है, वह एक प्रकार से उन तथाकथित उच्च विद्यालयों की ही देन है।

भारतेंदु जी के अनुसार समाज की उन्नति मातृभाषा की उन्नति में ही निहित है। इस वाक्य की गंभीरता व गहनता को समझना अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक विकसित राष्ट्र अपनी मातृभाषा के प्रति पूर्णतः समर्पित है। अनेक योग्यताएँ होने पर भी हम अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पित नहीं है, हमें हिन्दी पर विश्वास ही नहीं है। हमारा भारत अनेकता में एकता प्रदर्शित करता हुआ एक विशिष्ट देश है। जितनी भाषाएँ हमारे भारत में बोली जाती हैं, उतनी किसी अन्य देश में नहीं बोली जातीं। महात्मा गांधी जी ने कहा था प्रत्येक व्यक्ति के लिए तीन भाषाओं का ज्ञान अति आवश्यक है- मातृभाषा, राष्ट्रभाषा व अंतर्राष्ट्रीय भाषा। प्रत्येक व्यक्ति अंग्रेजी सीखने को लालायित रहता है, गैर हिन्दी भाषी राज्य अपनी क्षेत्रीय भाषा के लिए समर्पित रहते हैं किन्तु प्रत्येक बार मात्र हिन्दी ही उपेक्षित रह जाती है। हिंग्लिश भाषा के समर्थक बड़ी सरलता से कह तो देते हैं कि हिन्दी बहुत उदार भाषा है , प्रत्येक भाषा को सहजता से स्वयं में स्वीकार कर लेती है परंतु वे यह भूल जाते हैं कि अन्य भाषाओं को हिन्दी में मिश्रित कर वे मात्र इसे उपेक्षित ही नहीं कर रहे अपितु इसके अस्तित्व पर भी संकट उत्पन्न कर रहे हैं।

अब बात करते हैं कि हिन्दी की उपेक्षा हमारे लिए अभिशाप कैसे है। स्वयं को पश्चिमी सभ्यता में ढालने के क्रम में हम यह भूल रहे हैं कि पड़ोसी का मकान कितना ही भव्य क्यों ना हो,वह हमारा घर नहीं हो सकता। प्रत्येक क्षेत्र में मौलिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। हमारे कुछ भाई-बहन हिन्दी भाषी होने में भले ही शर्म करें, किन्तु उनकी पहचान सदैव हिन्दी भाषी के रूप में ही की जाएगी। भले ही भारत में हिन्दी की उपेक्षा करने वालों की संख्या हिन्दी से प्रेम करने वालों से अधिक हो जाये, तब भी भारत एक हिन्दी राष्ट्र ही रहेगा। संपूर्ण विश्व की दृष्टि में भारत की पहचान कराने वाले विभिन्न बिन्दुओं में से हिन्दी भी एक मुख्य बिन्दु है व सदैव रहेगा। ऐसे में यदि हम भारतीय ही हिन्दी को उपेक्षित करते-करते उसे अवसान की ओर ले जायेंगे तो संपूर्ण विश्व में मात्र हास्य का पात्र ही बनेंगे। अपनी संस्कृति, अपनी भाषा बचाने का दायित्व हम पर ही है, इसे विलुप्त होने देंगे तो विश्व हमें ही उपेक्षित करेगा; जो कि हमारे लिए अभिशाप समान ही होगा।

अतः हिन्दी की महत्ता को समझिए। अपने बच्चों का अंग्रेजी से परिचय कराने से पूर्व हिन्दी से परिचय कराइए। स्मरण रहे, अपनी मातृभाषा का एक अच्छा ज्ञाता ही दूसरी भाषाओं के साथ पूर्णरूपेण न्याय कर सकेगा। अपनी माँ को मस्तक पर सजाइए। हिन्दी से प्रेम करिए, उसे धारण करने में शर्म नहीं। हिन्दी पर गर्व करिए, उपेक्षा नहीं। गर्व से कहिए कि हम हिन्दी भाषी हैं।


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