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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

आखिरी कोशिश

मुरलीधर वैष्णव

दोनों ने कोई सात साल पहले प्रेम विवाह किया था। अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध। विवाह के एक डेढ़ साल तक दोनों के बीच ठीक ठाक रहा। एक बेटा भी हो गया। फिर धीरे-धीरे दोनों को एक दूसरे की कमियां खलने लगी। आपसी दूरियां एक बार पैदा हुई तो बढ़ती ही गई। दोनों परिवार के महत्व और उसकी शक्ति को महसूसने में असफल रहे। और एक दिन तैश में आ कर पत्नी अपने बेटे को लेकर पीहर चली गई। फिर कुछ अर्से बाद नौबत यहां तक आ गई कि लोगों के बहकावे में आ कर पत्नी ने सास-ससुर व ननद को भी लपेटते हुए अपने पति पर दहेज-प्रताड़ना, तलाक, घरेलू हिंसा व भरण-पोषण राशि दिलाने के चार मुकदमें ठोक दिये।

आज उच्च न्यायालय-मध्यस्थता केन्द्र में वे दोनों पति-पत्नी अपने छः साला बेटे रोहित के साथ मेरे समक्ष बैठे हैं। मध्यस्थ के रुप में मैंने अनेक तरह से उन्हें समझा कर उनके बीच सुलह कराने का भरपूर प्रयास किया लेकिन दोनों अपनी जिद पर अड़े हैं। दोनों केवल एक ही बात पर सहमत हैं कि 'वी आर एट ए पोइंट आफ नो रिटर्न'।

"कितना प्यारा बच्चा है", मैंने रोहित के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे एक चाकलेट दी।

"मुझे अफसोस है कि आप दोनों के बीच कोई गंभीर विवाद नहीं होते हुए भी आप लोग सुलह न करने की अपनी जिद पर अड़े हैं। इस बच्चे के भविष्य तक के प्रति भी चिंतित नहीं है। खैर, कोई बात नहीं, चलिये हम विदा होने से पहले एक कप चाय जरूर पी लें।" मैं उन तीनों को पास ही स्थित मध्यस्थता केन्द्र के बायोस्कोप वाले कक्ष में ले गया।

"चाय आती है तब तक हम एक सच्ची घटना की यह पन्द्रह मिनट की शॉर्ट फिल्म देखते हैं।" मैंने उनसे आग्रह किया। मैंने अभी भी उनका घर बसाने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी।

वह फिल्म भी तलाक पर आमादा पति-पत्नी के ऐसे ही एक मामले की सच्ची घटना पर आधारित थी। थोड़ी ही देर में चाय आ गई। लेकिन मैंने देखा कि दोनों पति-पत्नी फिल्म को देखने में इतने तल्लीन हो गये थे कि वे चाय पीना ही भूल गये। मैंने कनखियों से देखा कि धीरे-धीरे पति-पत्नी के चेहरों पर भय] चिंता और दुःख की छायाएं तैरने लगी थी। फिल्म के चरम बिंदु पर तो दोनों की आंखों से अश्रुधारा बह चली थी। दूसरी ओर रोहित डर के मारे अपनी मां से चिपक गया था। दरअसल फिल्म की कहानी में पति-पत्नी के ऐसे ही झगड़े] अलगाव और तनाव के बीच एक दिन उनके बच्चे को सड़क पर से कोई अपहरण कर ले जाता है। करीब छः माह के अथक प्रयास के बाद पुलिस द्वारा वह बच्चा दिल्ली की एक सड़क पर भीख मांगते पाया जाता है। उसके दाहिने हाथ की कुछ अंगुलियां कटी हुई होती हैं। भीख मंगवा कर कमाई करने वाली आपराधिक गेंग पकड़ी जाती है।

"सर, आपका बहुत धन्यवाद। हम अब अपने घर लौट रहे हैं...।" सजल नेत्रों से दोनों ने मेरे प्रति कृतज्ञता भाव से चरण स्पर्श किये।


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