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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

मूक श्रोता

कल्पना भट्ट

बड़ा अजीब तालाब था वो। कुछ एक छोटी मछलियों को छोड़कर उस तालाब की सभी मछलियाँ खुद के लिखे गीत गाती थीं, हालाँकि बड़ी मछलियों को चुप रहने वाली मछलियाँ पसंद नहीं आती थीं।

ऐसे ही एक दिन गीत गोष्ठी के समय एक बड़ी मछली ने चुप रहने वाली छोटी मछली को देखा तो उसके पास जाकर कहा, "कम आती हो लेकिन तुम्हें यहाँ गोष्ठी में देखकर अच्छा लगता है।"

उस छोटी मछली ने उत्तर दिया, "इस उथले तालाब में विचरण करना भी मुश्किल हो जाता है! जब भी समय मिलता है आ ही जाती हूँ, आप सभी के मीठे गीत सुनने का अवसर मिल जाता है।"

"ओह तो आज भी श्रोता बनकर ही आयी हो!" बड़ी मछली ने गलफड़ फड़फड़ाते हुए कहा।

"जी हाँ, लेकिन आजकल श्रोता मिलते कहाँ हैं। गीत गोष्ठी में हर मछली को सुनाने की ही लालसा होती है।"

बड़ी मछली ने व्यंग्य से हँसते हुए साथ तैर रही दूसरी मछली से कहा, "सही कहा है इसने, हमें तो आभारी होना चाहिये। क्यों न एक अच्छा सा प्लवक इन मूक मछलियों के लिए भी इनाम के तौर पर रख दिया जाये?"

"बिल्कुल होना चाहिये, क्योंकि दूसरी मछलियां सिर्फ खुदकी वाह-वाही हो इसलिए आपके गीतों को बिना सुने-समझे ही वाह-वाह कर देती हैं और इस तालाब से बाहर के इंसान और जानवर तो आपको सुनने आयेंगे नहीं।" छोटी मछली ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अरे सुनो तो..."

कहकर वह बड़ी मछली अगले ही क्षण तेज़ी से तैर कर किसी और मछली को पुकारती हुई दूर चली गयी।


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