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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

सब अपने ही हुये पराये ....

वीरेन्द्र कौशल

सब अपने ही हुये पराये गैर हुये अपने ही साये जिनको अब तक समझा अपना वो ही तो पैसों से नहाये सब अपने ...... बचपन अपना खूब सलोंना जीवन जैसे कोई खिलौना सोच ऊँची पर संगदिल बौना वक़्त भी कैसे खेल खिलाये सब अपने ..... दोस्त खून सब अपने जैसे लगते सब ही कोहिनूर जैसे कहीं दिखावा ही छलके ऐसे आँखे बस अब नज़र चुराये सब अपने .... अपने ही सदा देते सहारा भला गैरों से भी कोई हारा ज़ब भी मिला जवाब करारा राजदार ही मोर्चा संभाले पाये सब अपने .... रेत मुठ्ठी में रुकता जैसे हालात हमारे भी बिल्कुल वैसे पता नहीं वो सब करते कैसे सुना गिरगिट जैसे रंग बदल जाये सब अपने ..... खाली हाथ जैसे कोरा काग़ज़ वक़्त अपना पर रहा अपाहिज़ सब ने दुहा जैसे लगा ज़ायज़ हम सब यह समझ न पाये सब अपने .... सारे पर्व ही हमारे लगते पर अपनो से हारे लगते पास बुलायें तो दूर भगते सब मोबाईल सी रेंज बनाये सब अपने ....


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