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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

अधूरी चाहत

स्वीटी कुमारी

कभी तो करीब आकर देख लेते मेरे दिल की हालत कैसे कह दिया तुमने सह लेंगे जो देगी हमें किस्मत कैसे कह दूं कि तेरे बिन अधूरी है मेरे दिल की हर हसरत कैसे कह दूं कि हर घड़ी बस सुनती हूं मैं तेरी ही आहट मैं कैसी हूं यह जानने की कभी तुमने समझी नहीं जरूरत कैसे खो गए तुम खुद में, ना मिली कभी तुम्हें मेरे लिए फुर्सत कभी तो तुम कहते, मैं हूं तेरे साथ, मुझे तुमसे है सच्ची चाहत हर किसी से लड़ लेती मैं, यदि होती तुम्हें मुझसे सच्ची मोहब्बत कभी देखा था मैंने खुद के लिए तेरी आंखों में हसरत कभी होती थी सिर्फ मेरे लिए, तेरी तड़प, तेरा वक्त, तेरी चाहत दुनिया भुला कर खो जाते थे तुम मेरी बाहों में मेरी जुल्फों के साए में नसीब होती थी तुम्हें जन्नत कहां गया वो प्यार, कहां गई वो जमाने से लड़ने की ताकत किस जहां में खो गये तुम, तेरा वादा, तेरी उल्फत कैसे भुला दिया तुमने मुझे, अब जाना कि ये है तुम्हारी आदत पर, मैं कैसे भुला दूं तुझे, कैसे करूं तुझसे नफ़रत तेरा साथ जो छूटा, दिल जो टूटा, तो टूट गई मेरी हिम्मत हर ख्वाब अब सपना ही है, ना बन सका हकीकत

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