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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

कृष्ण प्रतीक्षा

सृष्टि सिंह

रोम-रोम रटे कृष्ण-कृष्ण,पर कृष्ण सांवरिया आये ना। अपलक नयन निहारे राधा, दरस श्याम दिखलाये ना ।। निधिवन रंगमहल की अवनी प्राणहीन वीरान पड़ी है। पायल की झंकार मौन ,बिखरी वंशी की तान पड़ी है। दृग्जल बरसे सावन सम , कोई पीर समझ ये पाये ना। अपलक नयन निहारे राधा , दरस श्याम दिखलाये ना। कृष्ण वियोग अग्नि में जल के, सूर्य-सुता हुयी कारी। प्रसुनों ने यौवन तज डाला , शिली-मुख ने फुलवारी । पतझड़ छाया बरसाने में ,मधुमास ऋतु भी आये ना। अपलक नयन निहारे राधा,दरस श्याम दिखलाये ना ।। कदम्ब वृन्त इठलाना भूला,कुञ्जन में छायी विरक्ति । ग्वाल-बाल ने त्यागी क्रीड़ा , सुरभि ने रम्भण प्रवृत्ति । ग्वालिन की गुम हुयी चेतना प्रणय गीत कोई गाये ना। अपलक नयन निहारें राधा,दरस श्याम दिखलाये ना ।। प्रेमसरोवर के हंसयमल ने रो-रो प्राण को त्याग दिया । कलानिधि ने व्याकुल होकर चंद्रकला परित्याग किया। धरा,व्योम,ऋक्षों से ब्रजकी विरहदशा लखि जाये ना । अपलक नयन निहारें राधा, दरस श्याम दिखलाये ना ।।

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