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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

शराबी

शिवनंदन शिबू

शराब पीने से जो गम मिट जाते मधुशाला ही हम खरीद ले आते बैठ ज़माने के साथ, सारी मधुशाला ही पी जाते। ना रहते गम, ना रहती फिर मधुशाला फिर कितनों के टूटते घर बच जाते एक निवाला मुंह में सबको, रोटी मिल जाते। क्यों बिकता है मद्य मधुशाला में जो पीने से ना मिटते हैं गम न होते हैं दर्द ही कम पल भर की मौजों में, सब को बेज़र कर जाते हैं। नरयुगों की दुनियां छोड़, मद्य की दुनियां में बह जाते हैं। मद्य वाले मद्य पीकर, किसी राहों पे यूँ ही पड़े रह जाते हैं। न जाने कितनों की हस्तियां ले डूबी ये मद्य फिर भी किसी को मिला न मंजिल। जिस पथ का कोई मंजिल ना कोई ठिकाना उस पथ पर चलना सोच लिए तुम कैसे जिन अधरों पर मुस्कान नहीं उन अधरों पर मद्य लिए तुम कैसे। क्या भूल गए तुम अपने कर्तव्यों को मध के नशे में इतने कि भूल गए खुद को आश लगाये कोई बैठे हैं कब निःमध घर आओगे। जिस पथ कि राहे मधुशाला को जाती उस पथ कि राहे घर को भी आती।

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