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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

तुम्हारी नज़र में

संघमित्रा चंचल

तुम्हारी नज़र में मै क्या हूं मै नहीं जानती पर मेरी नजर में तुम मेरा सबकुछ हो मेरे जीवन का आधार हो शांत, शीतल बहते नदी की धार हो तुम्हारे अंदाज-ए-नशि़स्त तुम्हारा रफ़्तार तुम्हारा गुफ्ता़र सब भाता है मुझे तुम्हारा यूं मुस्कुरा देना हां तुम्हारे करीब खींच लाता है मुझे तुम जब नजरों से ओझल हो बादलों में कहीं छुप से जाते हो तब भी ये नजरें बेकरार हो तुम्हारी ही राह तकता है सच कहूं तो मेरी नजर में तुम मेरा सम्पूर्ण ब्रह्मांड हो..!


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