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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

जैसे कि . . .

सागर कमल

जैसे नदी में दोहराव नहीं होता जैसे हवा सिर्फ़ बहना जानती है जैसे कविता का धर्म है सिर्फ़ कविता होना ! जैसे हाळी धरती का सीना चीरता है इसलिए नहीं कि उसे 'चीर' पसंद है बल्कि इसलिए कि वह बीज को चूमना और फ़सल को दुलारना चाहता है ! जैसे किताब का मुड़ा हुआ पन्ना ठोस प्रमाण है लगावट का जैसे चूल्हे की आग में संघर्ष पकता है माँ के जनमभर का ! ! जैसे पीढ़ियों का अंतराल एक चिलम के धुएँ में उड़ जाता है जैसे धुआँ शायद बादल बन जाता है ! जैसे, जैसे, जैसे . . . . कि मैं बस तुम्हें प्रेम करना चाहता हूँ क्योंकि यही तो एक समस्या है कि इसके सिवा मुझे कुछ आता भी नहीं !!


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