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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

संबंध

सागर कमल

तुमने हमेशा मुझे एक टूटी हुई चप्पल की तरह निबाहा ! और मैंने ? तुम्हें अपनी लाइब्रेरी में रखी किसी किताब की तरह चाहा ! मैं तुम्हारे लिए सदा ही एक डस्टबिन से ज़्यादा कुछ नहीं रहा और तुम मेरे निकट जैसे मोक्ष बनकर रहीं ! हमारा संबंध भी नाजायज़ माँ-बाप की तरह था कि ना कोई दुश्मनी ना दोस्ती ही रही गड़े हुए धन पर साँप की तरह था ! ये निबाहट, ये चाहत ऐसे रही कि जैसे खट्टी दही में थोड़ी मीठी खाँड मिला दी जाए जैसे बिनब्याही माँ अपने बच्चे को जिए जाए ! चाहे जो कुछ रहा हो तुम्हारे लिए पर मेरे लिए कमबख़्त प्रेम से कम कुछ भी नहीं !


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