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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

प्यारा बचपन

रीता तिवारी "रीत"

चिंता रहित खेलना खाना , वह फिरना निर्भय स्वच्छंद। कैसे भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद। मां की लोरी प्यार पिता का, दादा दादी का वह प्यार। देता था आनंद सदा ही, बचपन का वह घर संसार। नहीं पता थी दुनियादारी, ना कोई भी हिस्सेदारी। भाई बहनों के प्रति प्रेम, नहीं कोई भी जिम्मेदारी। छोटी-छोटी नाव अनोखी, छोटी नदियां नाव भी छोटी। खेले खूब अनोखे खेल, छोटी पटरी छोटी रेल। पेड़ों के पत्तों में घुसना, स्कूल न जाने का ढूंढना बहाना। खेल-खेल में रूठना मनाना, एक दूजे को खूब सताना। नहीं पता चलती थी हार, नहीं पता चलती थी जीत। कहां गया वह बचपन बीत, अपने सपने अपनी रीत ।


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