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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

इतवारी रिश्ते

राजेश’ललित’

रिश्ते कितने कठिन बनाने भी निभाने भी पहले ख़ाली इतवार ढूँढो फिर बहाना जाना ;नहीं जाना रिश्ता दूर का पास का बुलाना ;नहीं बुलाना अमीर या ग़रीब घर से दिल से दूर या क़रीब चलें या न चलें चलो घर पर मनाते हैं रिश्ते संडे है न रिश्ते फिर कभी


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