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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

जजबात का दरिया

हेमराज

बहता रहा दूरतक मैं बहुत तिनके तक का सहारा न मिला, जज्बात के दरिया का कहीं किनारा न मिला ।। दिल की किसी से न कहना भावनाओं में न बहना, घुट जाना जहर पी लेना आंसू पीते रहना, खुद से शिकायत करना न करना किसी से गिला ।। जजबात के दरिया का कहीं किनारा न मिला ।। सोचा था मिलेगा कोई कोई तो साथ देगा, हालत पे तरस खाकर गले से लगा लेगा, न दिल को बहलाया न घावों को सिला ।। जजबात के दरिया का कहीं किनारा न मिला ।। तुम भी सबक सीख लो लो खा आज ये कसम निभाना हर एक मगर दिल्लगी छोड़ हर रस्म कुछ न नसीब होगा यूँ दिमाग को हिला ।। जजबात के दरिया का कहीं किनारा न मिला ।। वक्त ने जो सिखाया तुमको पेश कर दिया, दिल को किसी से जोड़ कर खुद को बेजान कर दिया, औरों को रुला के वो हंसते हैं खिलखिला ।। जजबात के दरिया का कहीं किनारा न मिला ।।


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