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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

सोच

हँस राज ठाकुर

सोच रहा था, कुछ सोचूँ , ये सोच के मैंने कुछ सोचा , सोच - सोच के सोचता गया , मैं सोच न पाया, तो क्या सोचा । बड़ी विचित्र चीज है सोच , इन्सान की ताकत है ये सोच , तुम समझ गए, तो सही सोचा , मैं समझ न पाया, तो क्या सोचा । प्रेम-बैर सब लाती है सोच , मन सबका भरमाती है सोच , जो संभल गया, वो सही सोचा , मैं न संभला, तो क्या सोचा । रंग-बिरंगी दुनिया की “हँस“, रंग-बिरंगी होती है सोच , सब रंग गए, तो सही सोचा , मैं न रंग पाया, तो क्या सोचा । बड़े लोगों की सोच बड़ी है , तू छोटा, तेरी छोटी सोच , सोच - सोच के सोचता गया , मैं सोच न पाया, तो क्या सोचा ।


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