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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

सपने

हँस राज ठाकुर

बड़े विचित्र होते हैं सपने बिना पंखों के ही उड़ान भर लेते हैं सपने अमीर हो या गरीब सभी के होते हैं सपने बड़े चंचल होते हैं सपने कभी अधूरे तो कभी सच होते हैं सपने टूट चुके इन्सान को भी राह दिखाते हैं सपने आखिरी साँस भी शेष बची हो तो जीने की राह दिखाते हैं सपने कभी निरर्थक तो कभी सार्थक साबित होते हैं सपने कभी परखते धैर्य को कभी हौंसलों को आजमाते हैं सपने कभी दिन को कभी रात को आते हैं सपने कभी ‘हँस’ को कभी ‘राज’ को शतरंज सिखाते हैं सपने


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