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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

नशा

अनिल कुमार

नशा भी अजीब है साहब शराब का हो, तो दुनिया भूला देता है गर पैसे का हो, तो दुनिया ही कदमों में ला देता है नशे के हजारों रूप-रंग है सूरत का नशा हो, तो सारी दुनिया बे-रंग है नशे में इस कदर ढूबे हैं लोग नाम का नशा हो, तो पहचानकर भी दूजे है लोग पद का अधिकार अभिमान लाता है पदाधिकारी बन के आदमी आदमी को भूल जाता है शोहरत का नशा आदमी से इंसान को खुदा भी बनाता है नशे की हर चाल मतवाली है नशा हर आदमी पर भारी है पर नशा जब हो खुद्दारी का स्वाभिमान और ईमान की बारी का तो हर नशे की खुमारी बेदम-सी झटपटाती है नशा कैसा भी हो, हर नशे में आदमी की मति मारी जाती है।


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