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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

कब तक

डॉ० अनिल चड्डा

कब तक, बोलो कब तक, मैं तेरा इंतजार करूँ? कब तक, बोलो कब तक, मैं इकतरफा तुझे प्यार करूँ?? मसरूफतियाँ मेरी भी हैं, फिर भी याद कर ही लेता हूँ, समय निकाल कर, याद भी नहीं करोगी तुम, कब तक, बोलो कब तक? प्यार हो न हो, तुझे मुझसे, करार हो न हो, तेरा मुझसे, यूँ भी तो ख्याल आ ही जाता है, अंधेरे में मन को रखोगी, कब तक, बोलो कब तक? सदियों से ये होता आया है, कोई तो करता प्यार मगर, कोई प्यार नहीं समझता है, बिन प्यार के ही रहोगी, कब तक, बोलो कब तक?


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